भारत की आज़ादी का संघर्ष केवल राजनीतिक सत्ता हासिल करने की कहानी नहीं था, बल्कि यह आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान की खोज भी थी। जब महात्मा गांधी ने चरखा उठाया, तो उनका उद्देश्य केवल सूत कातना नहीं था बल्कि विदेशी उद्योगों की जकड़न से मुक्ति पाना था। उन्होंने यह संदेश दिया था कि स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी जब उसका आधार आत्मनिर्भर समाज और स्वदेशी उत्पादन हो। आज़ादी के इतने दशकों बाद भी यह प्रश्न अब तक प्रासंगिक बना हुआ है, बस उसका रूप बदल गया है। बीसवीं सदी में हमारी चुनौती विदेशी सत्ता से मुक्ति थी, इक्कीसवीं सदी में हमारी चुनौती डिजिटल गुलामी से मुक्ति है।
आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और जनसंख्या के लिहाज से सबसे बड़ा उपभोक्ता बाज़ार भी। मोबाइल फोन हर हाथ में है, इंटरनेट गाँव-गाँव तक पहुँच चुका है और डिजिटल भुगतान से लेकर सोशल मीडिया तक हर क्षेत्र में क्रांति देखी जा सकती है। अगस्त 2024 में सिर्फ एक महीने में भारत में 13 अरब से अधिक डिजिटल लेन-देन हुए। यह संख्या अपने आप में बताती है कि डिजिटल ढाँचे ने हमारे जीवन को किस हद तक बदल दिया है। आधार कार्ड, यूपीआई और अन्य सेवाएँ इस बदलाव का प्रमाण हैं। भारत ने तकनीकी उपयोग में न केवल छलांग लगाई है बल्कि कई क्षेत्रों में दुनिया को रास्ता भी दिखाया है। लेकिन इस चमकदार तस्वीर के पीछे एक गंभीर सच्चाई भी छिपी है, और वह यह कि हमारे तकनीकी ढाँचे का बहुत बड़ा हिस्सा विदेशी कंपनियों और विदेशी तकनीक पर निर्भर है।
हमारे मोबाइल फोनों का अधिकांश हिस्सा चीन से आता है। हमारे स्मार्टफोन गूगल और एप्पल जैसे अमेरिकी कंपनियों के ऑपरेटिंग सिस्टम पर चलते हैं। हमारे डेटा का बड़ा भाग विदेशी सर्वरों पर संग्रहित होता है। हमारी सोशल मीडिया की बातचीत, हमारी तस्वीरें और हमारे विचार फेसबुक, इंस्टाग्राम और एक्स (ट्विटर) जैसे विदेशी प्लेटफॉर्म पर दर्ज होते हैं। यहां तक कि हमारी कृत्रिम बुद्धिमत्ता की शुरुआत भी विदेशी कंपनियों से हो रही है। यह सब हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या यह स्वतंत्रता है या किसी नए प्रकार की परतंत्रता?
डिजिटल परतंत्रता का सबसे बड़ा खतरा यह है कि यह हमें अदृश्य रूप से नियंत्रित करती है। यदि किसी दिन गूगल अपनी सेवाएँ भारत में रोक दे तो लाखों करोड़ों लोग सूचनाओं तक पहुँचने से वंचित हो जाएंगे। यदि एप्पल अपने ऐप स्टोर से भारतीय ऐप्स को हटा दे तो भारतीय स्टार्टअप्स का पूरा व्यापार प्रभावित हो जाएगा। यदि फेसबुक और इंस्टाग्राम अचानक भारत में काम करना बंद कर दें तो हमारी सामाजिक बातचीत और आर्थिक गतिविधियाँ ठप हो सकती हैं। इस परिदृश्य को कल्पना नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ऐसे उदाहरण दुनिया के अन्य हिस्सों में पहले ही देखे जा चुके हैं। यही वह स्थिति है जिसे हम डिजिटल गुलामी कह सकते हैं।
डिजिटल युग में डेटा को नया तेल कहा जाता है। लेकिन यह तेल हमारे देश की धरती पर नहीं संग्रहित हो रहा। भारतीय नागरिकों का व्यक्तिगत और सामूहिक डेटा विदेशी सर्वरों पर रखा जाता है। इसका अर्थ है कि हमारी वित्तीय आदतें, स्वास्थ्य संबंधी सूचनाएँ, सामाजिक व्यवहार और यहाँ तक कि राजनीतिक रुझान भी विदेशी कंपनियों के पास दर्ज हो सकते हैं। यह केवल व्यक्तिगत गोपनीयता का मामला नहीं है बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का भी प्रश्न है। यदि कोई विदेशी शक्ति इन आंकड़ों का दुरुपयोग करती है, तो वह भारत की सामाजिक संरचना, चुनाव प्रक्रिया और आर्थिक स्थिरता तक को प्रभावित कर सकती है।
स्वतंत्रता का असली अर्थ यह है कि किसी राष्ट्र का अपनी आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दिशा पर पूरा नियंत्रण हो। तकनीकी स्वतंत्रता इसका नया आयाम है। तकनीकी संप्रभुता का अर्थ है कि कोई देश अपनी डिजिटल अवसंरचना, डेटा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, दूरसंचार और साइबर सुरक्षा पर स्वायत्त नियंत्रण रखे। यदि किसी देश की शिक्षा, स्वास्थ्य, सेना और अर्थव्यवस्था विदेशी तकनीक पर निर्भर है तो उसकी स्वतंत्रता अधूरी कही जाएगी।
भारत ने इस चुनौती को पहचानते हुए कई प्रयास शुरू किए हैं। डिजिटल इंडिया मिशन ने इंटरनेट और ई-गवर्नेंस को गाँव-गाँव तक पहुँचाने का प्रयास किया। आत्मनिर्भर भारत अभियान ने हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर निर्माण पर बल दिया। भारतनेट परियोजना का लक्ष्य है कि हर गाँव तक ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क पहुँचाया जाए। सरकार ने 6जी विज़न डॉक्यूमेंट जारी किया ताकि भविष्य में भारत केवल उपभोक्ता न बने बल्कि तकनीक का निर्माता भी बने। ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ओएनडीसी) की शुरुआत अमेज़न और फ्लिपकार्ट जैसे विदेशी दिग्गजों के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए की गई। कृत्रिम बुद्धिमत्ता में भी सर्वम एआई जैसे स्टार्टअप भारतीय भाषाओं पर आधारित चैटबॉट बना रहे हैं। इसके अलावा, सेमीकंडक्टर निर्माण के लिए भी बड़े निवेश की घोषणा हुई है।
लेकिन आत्मनिर्भरता की राह आसान नहीं है। विदेशी कंपनियों के पास अरबों डॉलर का निवेश और दशकों का अनुभव है, जबकि भारतीय स्टार्टअप पूँजी की कमी और सीमित संसाधनों के साथ काम कर रहे हैं। प्रतिभा पलायन भी एक बड़ी चुनौती है। भारतीय इंजीनियर गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और ओपनएआई जैसी कंपनियों का नेतृत्व कर रहे हैं, लेकिन अपने देश में उन्हें उतने अवसर नहीं मिलते। सेमीकंडक्टर का संकट भी गंभीर है। भारत आज भी 90 प्रतिशत चिप्स आयात करता है। साइबर सुरक्षा ढाँचा अभी भी कमजोर है और हर दिन लाखों साइबर हमले भारत की संस्थाओं को निशाना बनाते हैं। इसके अलावा, तकनीक अभी भी अंग्रेज़ी केंद्रित है। जब तक भारतीय भाषाओं में डिजिटल समाधान उपलब्ध नहीं होंगे, तब तक डिजिटल स्वतंत्रता अधूरी रहेगी।
दुनिया के अन्य देशों की ओर देखें तो यह स्पष्ट होता है कि डिजिटल स्वतंत्रता का प्रश्न वैश्विक है। अमेरिका और चीन के बीच टेक शीत युद्ध चल रहा है। चीन ने हुआवेई, टेनसेंट और अलीबाबा जैसी कंपनियों को सरकारी संरक्षण दिया और आज वह वैश्विक तकनीकी शक्ति बन चुका है। यूरोप ने जीडीपीआर जैसे सख्त डेटा संरक्षण कानून बनाकर डिजिटल संप्रभुता की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। इस पृष्ठभूमि में भारत यदि केवल उपभोक्ता बना रहता है तो वह तकनीकी उपनिवेशवाद का शिकार हो सकता है।
समाधान के रूप में भारत को अनुसंधान और विकास में भारी निवेश करना होगा। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) और अन्य विश्वविद्यालयों को वैश्विक स्तर के अनुसंधान केंद्रों में बदलना होगा। भारतीय स्टार्टअप को वैसा ही संरक्षण देना होगा जैसा चीन ने अपनी कंपनियों को दिया। भारतीय भाषाओं में तकनीकी समाधान विकसित करने होंगे ताकि तकनीक हर भारतीय तक सहज पहुँच सके। साइबर सुरक्षा का ढाँचा मज़बूत करना होगा और हर राज्य में साइबर लैब और प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करने होंगे। सबसे महत्वपूर्ण है कि डिजिटल आत्मनिर्भरता को जन आंदोलन बनाया जाए। जैसे स्वच्छ भारत अभियान को जन आंदोलन का रूप दिया गया, वैसे ही डिजिटल स्वावलंबन को भी नागरिक स्तर तक ले जाना होगा।
आज से सौ साल पहले महात्मा गांधी ने चरखा उठाकर आत्मनिर्भरता का प्रतीक गढ़ा था। आज के समय में हमें एक नया चरखा खोजना होगा- डिजिटल चरखा। यह चरखा तकनीकी संप्रभुता है। जब हमारे मोबाइल में भारतीय चिप्स लगेंगे, जब हमारे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भारतीय होंगे, जब हमारी कृत्रिम बुद्धिमत्ता भारतीय भाषाओं में काम करेगी और जब हमारा डेटा हमारे ही देश में सुरक्षित रहेगा, तभी हम सच्चे अर्थों में स्वतंत्र कहलाएँगे।
भारत की वास्तविक स्वतंत्रता अब डिजिटल स्वतंत्रता पर निर्भर है। यह केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है बल्कि हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह स्वदेशी तकनीक को प्राथमिकता दे। यह केवल तकनीकी प्रश्न नहीं है बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए नई आज़ादी की पुकार है। यदि भारत समय रहते अपनी राह चुन लेता है और डिजिटल गुलामी से मुक्त हो जाता है, तो आने वाला इतिहास यही लिखेगा कि इक्कीसवीं सदी भारत की डिजिटल आत्मनिर्भरता की सदी थी।
–ऋतिका राजेश मेंढे
स्नातक छात्रा, धनवटे नेशनल कॉलेज, नागपुर (महाराष्ट्र)










