भारत में नारीवाद को अक्सर बाहरी विचार कहकर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। यह कहा जाता है कि यह पश्चिम से आयातित सोच है, जो हमारी संस्कृति और परंपरा पर थोपा गया है। लेकिन जब हम गहराई से देखते हैं तो समझ आता है कि यह विचार किसी विदेशी ज़मीन से नहीं आया, बल्कि हमारी अपनी धरती, हमारी अपनी कहानियों और संघर्षों से जन्मा है। भारत की असंख्य बेटियों की अधूरी पढ़ाई, उनका समय से पहले विवाह, घर की चारदीवारी में कैद जीवन और कार्यस्थल पर होने वाले भेदभाव ही नारीवाद की असली ज़मीन हैं।
नागपुर की प्रिया (बदला हुआ नाम) अपनी यादें सुनाती हैं कि वो चौदह साल की उम्र में उन्हें स्कूल छोड़कर शादी करनी पड़ी। किताबें छिन गईं और उनकी जगह हाथों में चौका-बरतन थमा दिए गए। उनका भाई शहर पढ़ने भेजा गया, लेकिन उनसे कहा गया कि लड़की होकर इतने बड़े सपने मत देखो। सीमा की यह पीड़ा असामान्य नहीं है, बल्कि भारतीय समाज की लाखों कहानियों का प्रतिबिंब है। यह वही अन्याय है जिसके ख़िलाफ़ नारीवाद आवाज़ उठाता है।
बीते दशकों में भारतीय न्यायपालिका ने महिलाओं की बराबरी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई है। 1997 का विशाखा बनाम राजस्थान राज्य केस कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ पहला ठोस क़दम था। इसने दिशा-निर्देश दिए और बाद में इन्हीं पर आधारित होकर 2013 का यौन उत्पीड़न निरोधक क़ानून बना। 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक़ को असंवैधानिक घोषित किया, जिससे मुस्लिम महिलाओं को बड़ी राहत मिली। 2018 में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर आए फैसले ने यह स्पष्ट किया कि आस्था के नाम पर उन्हें दरकिनार नहीं किया जा सकता। और 2022 में अदालत ने अविवाहित महिलाओं को भी गर्भपात का अधिकार देकर साफ कर दिया कि महिला के शरीर और उसके फैसले पर किसी और का नियंत्रण नहीं हो सकता।
ये फैसले बताते हैं कि क़ानून बराबरी की दिशा में रास्ता खोल सकता है। लेकिन यह भी सच है कि समाज का चेहरा इतनी जल्दी नहीं बदलता। कानून बनने के बावजूद महिलाएँ घर और दफ़्तर दोनों जगह भेदभाव का सामना करती हैं। दिल्ली की एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाली स्नेहा (बदला हुआ नाम) कहती हैं कि उनके और उनके पुरुष सहकर्मी का काम एक जैसा है, लेकिन वेतन में 15 से 20 प्रतिशत का अंतर है। जब उन्होंने यह मुद्दा उठाया तो उनसे कहा गया कि तुम जल्दी शादी कर लोगी और फिर घर पर ध्यान देना पड़ेगा। यह तर्क सिर्फ़ उनकी नहीं, बल्कि देश की हज़ारों कामकाजी महिलाओं की कहानी है।
ग्रामीण भारत में स्थिति और कठोर है। उत्तर प्रदेश और हरियाणा में आज भी ऑनर किलिंग की घटनाएँ सामने आती हैं, जहाँ बेटियों को अपनी पसंद से शादी करने या प्रेम करने की सज़ा मौत के रूप में दी जाती है। दलित और आदिवासी महिलाएँ तो दोहरी मार झेलती हैं। उन्हें जातिगत भेदभाव और लैंगिक शोषण का सामना एक साथ करना पड़ता है। उनके लिए बराबरी केवल एक सपना बनकर रह जाती है।
सोशल मीडिया ने नारीवाद को नया चेहरा दिया है। #MeToo आंदोलन ने यह दिखा दिया कि यौन उत्पीड़न का मुद्दा केवल चुप्पी और फुसफुसाहट का विषय नहीं है। यह हर कार्यस्थल, हर संस्था और हर उद्योग में मौजूद है। जब बॉलीवुड अभिनेत्रियों, पत्रकारों और विश्वविद्यालयों की छात्राओं ने अपनी कहानियाँ साझा कीं तो यह साफ हो गया कि असमानता का अनुभव किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है। यह आंदोलन यह भी स्पष्ट करता है कि नारीवाद का मक़सद पुरुषों के खिलाफ़ खड़ा होना नहीं है। असल में यह व्यवस्था के अन्याय और असमानता के खिलाफ़ प्रतिरोध है। यह उस समाज की मांग है जिसमें लड़की और लड़के दोनों के सपनों को बराबर महत्व मिले।
वैश्विक स्तर पर भी महिलाओं के आंदोलन का लंबा इतिहास है। उन्नीसवीं सदी के अंत तक यूरोप और अमेरिका में महिलाओं ने वोट के अधिकार के लिए आंदोलन चलाया। यही नारीवाद की पहली लहर थी। बीसवीं सदी के सत्तर के दशक में दूसरी लहर आई, जिसमें परिवार, कार्यस्थल और शिक्षा में बराबरी की मांग उठी। इसी दौर में बलात्कार, घरेलू हिंसा और प्रजनन अधिकार जैसे मुद्दे आंदोलन के केंद्र में आए। नब्बे के दशक में तीसरी लहर ने जाति, वर्ग, यौनिकता और पहचान को भी बहस में शामिल किया। और आज चौथी लहर, जिसे साइबर नारीवाद भी कहा जाता है, इंटरनेट और सोशल मीडिया पर सक्रिय है। #MeToo इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
भारत में नारीवाद के साथ एक और बड़ी समस्या यह है कि इसे लेकर भ्रांतियाँ फैली हुई हैं। अक्सर मज़ाक में कहा जाता है कि नारीवादियों का मक़सद पुरुषों को नीचा दिखाना है, या यह कि यह पश्चिमी संस्कृति का हिस्सा है। जबकि सच्चाई यह है कि नारीवाद का अर्थ है न्याय और बराबरी की माँग। यह सिर्फ़ महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि समाज के संतुलन और लोकतंत्र की मजबूती के लिए भी ज़रूरी है।
लैंगिक भेदभाव रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी झलकता है। यह कभी मज़ाक के रूप में सामने आता है, कभी कपड़ों पर टिप्पणी बनकर, तो कभी यह कहकर कि महिलाएँ कुछ कामों के लिए सक्षम नहीं होतीं। यह अदृश्य भेदभाव सबसे खतरनाक है क्योंकि इसे अक्सर लोग मज़ाक या परंपरा के नाम पर सही ठहराने लगते हैं।
महिलाओं के अधिकारों को अक्सर विशेष अधिकार की तरह देखा जाता है, लेकिन सच यह है कि वे वही मानवाधिकार हैं जिनसे उन्हें लंबे समय तक वंचित रखा गया। मानवाधिकार का मतलब है समान अवसर, गरिमा, सुरक्षा और स्वतंत्रता। अगर समाज की आधी आबादी ही इनसे वंचित रहे तो लोकतंत्र अधूरा रह जाता है।
भारतीय समाज की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि बराबरी का विचार क़ानून और किताबों तक सीमित रह जाता है, लेकिन ज़मीन पर उसका असर धीमा और अधूरा है। अदालतें फैसले देती हैं, कानून बनते हैं, आंदोलन खड़े होते हैं, लेकिन जब तक परिवार और समाज के भीतर सोच नहीं बदलेगी, तब तक वास्तविक बराबरी संभव नहीं।
नारीवाद का मक़सद पुरुष और महिला के बीच टकराव पैदा करना नहीं है। यह उस सोच के खिलाफ़ है जो यह मानती है कि महिला का स्थान केवल घर तक सीमित है, या उसकी भूमिका केवल पत्नी और माँ बनने तक है। असल में नारीवाद उस बराबरी की माँग है जिसमें हर इंसान को उसकी मेहनत, उसकी प्रतिभा और उसके सपनों के आधार पर अवसर मिले, न कि उसके लिंग के आधार पर।
भारत के लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए यह ज़रूरी है कि महिलाओं की बराबरी को केवल क़ानून तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उसे सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी अपनाया जाए। जब तक सीमा जैसी बेटियाँ पढ़ाई से वंचित रहेंगी, नेहा जैसी कामकाजी महिलाएँ असमान वेतन पाएँगी, और गाँवों की बेटियाँ ऑनर किलिंग की शिकार होती रहेंगी, तब तक नारीवाद की ज़रूरत बनी रहेगी।
महिलाओं के अधिकार अंततः मानवाधिकार ही हैं और जब तक समाज की आधी आबादी को समान अवसर, गरिमा और सुरक्षा नहीं मिलेगी, तब तक न तो बराबरी पूरी होगी और न ही लोकतंत्र। इसलिए यह लड़ाई अभी अधूरी है। इसे पूरा करने के लिए कानून के साथ-साथ समाज को भी बदलना होगा।
राजेश सारथी, (पत्रकार व शोधार्थी)











