भारत की आधी आबादी महिलाएँ हैं। कुल जनसंख्या का 48.20 प्रतिशत हिस्सा महिलाएँ हैं जबकि पुरुष 51.80 प्रतिशत हैं। यानी संख्यात्मक रूप से वे लगभग बराबरी पर हैं, लेकिन अवसर, सुरक्षा और अधिकारों में यह बराबरी कहीं दिखाई नहीं देती। भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति सदियों से उतार-चढ़ाव से गुजरती रही है। प्राचीन काल में उन्हें पुरुषों के समान दर्जा प्राप्त था, शिक्षा, अनुष्ठान और समाज के निर्णायक कार्यों में उनकी भूमिका मानी जाती थी। मध्यकाल में स्थिति विपरीत हो गई और वे पर्दे, घर की चारदीवारी तथा पितृसत्तात्मक बंधनों में सीमित हो गईं। आधुनिक भारत में महिलाओं ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष और विपक्ष की नेता जैसे पदों तक पहुंचकर समाज को एक नई दिशा दिखाई, लेकिन आम जीवन में उनकी सुरक्षा, गरिमा और स्वतंत्रता आज भी चुनौती बनी हुई है।
महिलाओं के खिलाफ हिंसा, भेदभाव और शोषण का सिलसिला जन्म से पहले शुरू हो जाता है। गर्भ में ही कन्या भ्रूण हत्या का खतरा रहता है। जन्म लेने के बाद उन्हें शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित किया जाता है। किशोरावस्था में बाल विवाह जैसी प्रथाएँ आज भी समाज के कई हिस्सों में जारी हैं। विवाह के बाद दहेज और घरेलू हिंसा जैसी समस्याएँ उनका पीछा करती हैं। बुजुर्ग होने पर उपेक्षा और असुरक्षा का सामना करना पड़ता है। यह स्थिति बताती है कि महिलाओं का जीवन गर्भ से लेकर कब्र तक संघर्षों से भरा है।
भारतीय संविधान महिलाओं को समानता और अधिकार की गारंटी देता है। अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता का अधिकार देता है। अनुच्छेद 15 धर्म, जाति, लिंग और जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव को निषिद्ध करता है। अनुच्छेद 16 रोज़गार और अवसर की समानता सुनिश्चित करता है। अनुच्छेद 39 समान काम के लिए समान वेतन की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 42 मातृत्व सहायता और मानवीय कार्य स्थितियों का प्रावधान करता है। पंचायतों में महिलाओं को राजनीतिक आरक्षण देने के लिए अनुच्छेद 243(डी) की व्यवस्था है। इसके बावजूद व्यवहार में महिलाएँ बराबरी की स्थिति तक नहीं पहुँच सकी हैं।
समाज में महिलाओं की स्थिति को समझने के लिए आँकड़े भी बहुत कुछ कहते हैं। 1990 के दशक की रिपोर्ट में केवल 9.2 प्रतिशत घरों की मुखिया महिलाएँ थीं, जबकि गरीबी रेखा से नीचे के घरों में यह प्रतिशत 35 तक पहुँच जाता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-4) बताता है कि 15 से 49 वर्ष की 30 प्रतिशत महिलाओं ने शारीरिक हिंसा का सामना किया है और 6 प्रतिशत ने यौन हिंसा का अनुभव किया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि हर तीन में से एक महिला अपने जीवनकाल में हिंसा झेलती है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, भारत में हर 20 मिनट में एक महिला के साथ बलात्कार होता है।
इन भयावह स्थितियों के बावजूद भारत का समाज महिलाओं को देवी स्वरूप मानता है। उन्हें माँ और बहन कहकर सम्मानित करता है, लेकिन वास्तविक जीवन में उनकी स्वतंत्रता और गरिमा का हनन होता है। यही भारतीय सामाजिक ढाँचे का सबसे बड़ा विरोधाभास है।
महिला आंदोलन इस स्थिति को बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण रहा है। 1970 के दशक में नारीवादी सक्रियता तेज हुई। मथुरा बलात्कार कांड के बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए, जिसने कानून में संशोधन कराने पर मजबूर किया। महिलाओं ने शराब विरोधी आंदोलनों में भाग लिया क्योंकि शराबखोरी को घरेलू हिंसा का मुख्य कारण माना जाता है। मुस्लिम महिलाओं ने तीन तलाक और शरीयत की पारंपरिक व्याख्याओं पर सवाल उठाए। 1990 के दशक में स्वयं सहायता समूहों और स्व-नियोजित महिला संघ जैसे संगठनों ने ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक शक्ति दी। मेधा पाटकर जैसी कार्यकर्ताओं ने नर्मदा बचाओ आंदोलन के जरिए महिलाओं की भागीदारी को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाया।
भारत सरकार ने 2001 को महिला सशक्तिकरण वर्ष घोषित किया और राष्ट्रीय महिला नीति लागू की। इसके तहत महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण पर जोर दिया गया। निर्भया कांड के बाद निर्भया कोष, वन-स्टॉप सेंटर और यौन अपराधियों के राष्ट्रीय डेटाबेस जैसी योजनाएँ शुरू की गईं। लेकिन इन सभी प्रयासों के बावजूद, हिंसा और भेदभाव की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं।
महिलाओं पर होने वाले अपराधों में कई रूप हैं। सबसे पहले कन्या भ्रूण हत्या और लिंग-चयनात्मक गर्भपात, जो समाज की गहरी जड़ें जमाई हुई पितृसत्तात्मक मानसिकता का प्रतीक है। इसके बाद दहेज हत्या आती है, जिसमें विवाह के बाद अतिरिक्त दहेज की मांग पूरी न होने पर महिलाओं को मौत के घाट उतार दिया जाता है। ऑनर किलिंग यानी सम्मान के नाम पर हत्या, समाज की संकीर्ण सोच का नतीजा है, जहाँ प्रेम विवाह या तयशुदा संबंधों से इनकार करने पर महिलाओं को मौत की सजा दी जाती है।
घरेलू हिंसा महिलाओं के जीवन का एक और कड़वा सच है। पति या रिश्तेदारों द्वारा शारीरिक, मानसिक और आर्थिक शोषण की घटनाएँ आम हैं। वैवाहिक बलात्कार आज भी भारत में अपराध की श्रेणी में नहीं आता, जबकि यह महिला की गरिमा और अधिकारों का खुला उल्लंघन है।
यौन शोषण और छेड़छाड़ सार्वजनिक जीवन की सबसे बड़ी समस्या बन गई है। सड़कें, सार्वजनिक परिवहन और कार्यस्थल महिलाओं के लिए असुरक्षित महसूस होते हैं। पॉश अधिनियम (कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए लाया गया, लेकिन उसके क्रियान्वयन में ढील है।
इन अपराधों के बढ़ने के पीछे कई कारण हैं। पितृसत्तात्मक मानसिकता सबसे बड़ा कारण है। शिक्षा और सरकारी अभियानों के बावजूद समाज महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने से कतराता है। पुलिस और न्याय व्यवस्था की नाकामी अपराधियों को खुलेआम घूमने की छूट देती है। अपराधों की जांच धीमी और दोषसिद्धि की दर बेहद कम है। सार्वजनिक स्थलों पर सुरक्षा का अभाव, जैसे सड़क पर रोशनी न होना, महिलाओं के लिए शौचालयों की कमी, उनकी असुरक्षा को और बढ़ाते हैं।
हाल के वर्षों में अपराधों की रिपोर्टिंग बढ़ी है। #MeToo आंदोलन ने महिलाओं को आवाज उठाने का साहस दिया। शिक्षा और जागरूकता के कारण अधिक महिलाएँ उत्पीड़न के खिलाफ सामने आ रही हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि दर्ज मामलों की संख्या बढ़ी है।
सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई कानून बनाए हैं। इनमें दहेज निषेध अधिनियम (1961), घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम (2005), बाल विवाह निषेध अधिनियम (2006), कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न अधिनियम (2013) और आपराधिक कानून संशोधन (2013 और 2018) प्रमुख हैं। पोक्सो अधिनियम बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करता है।
इसके अलावा, महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई योजनाएँ चलाई जा रही हैं। निर्भया कोष से सुरक्षा परियोजनाओं को वित्त पोषण दिया जाता है। वन-स्टॉप सेंटर हिंसा पीड़ित महिलाओं को एक ही जगह पर कानूनी, मनोवैज्ञानिक और चिकित्सीय सहायता उपलब्ध कराते हैं। गृह मंत्रालय ने महिला सुरक्षा प्रभाग की स्थापना की है। लेकिन कानून और योजनाएँ तभी प्रभावी हो सकती हैं, जब समाज की सोच बदले। इसके लिए लिंग संवेदीकरण जरूरी है। बच्चों को छोटी उम्र से ही लैंगिक समानता का संस्कार दिया जाना चाहिए। परिवारों में बेटा-बेटी के बीच भेदभाव नहीं होना चाहिए। हिंसा पीड़ितों से जुड़े कलंक को समाप्त करना होगा ताकि महिलाएँ खुलकर न्याय की मांग कर सकें।
कानूनी साक्षरता और जागरूकता भी जरूरी है। जीरो एफआईआर, महिला हेल्पलाइन और त्वरित न्यायालयों की जानकारी हर महिला तक पहुंचनी चाहिए। पुलिस और न्यायपालिका को संवेदनशील बनाना अनिवार्य है। मीडिया को भी अपनी भूमिका जिम्मेदारी से निभानी होगी और महिलाओं की आवाज़ को मंच देना होगा।
भारत में महिलाओं की स्थिति विरोधाभासों से भरी है। एक ओर वे राजनीति, खेल, कला और विज्ञान में नई ऊँचाइयाँ छू रही हैं, दूसरी ओर आम जीवन में सुरक्षा और सम्मान के लिए संघर्ष कर रही हैं। यह चुनौती केवल सरकार या कानून की नहीं, बल्कि पूरे समाज की है। जब तक पितृसत्तात्मक मानसिकता नहीं बदलेगी और महिलाओं को बराबरी का दर्जा व्यवहार में नहीं मिलेगा, तब तक संविधान की गारंटी अधूरी रहेगी।
महिला सशक्तिकरण का वास्तविक अर्थ केवल नीतियों और योजनाओं से नहीं, बल्कि सामाजिक सोच और व्यवहार में बदलाव से ही पूरा होगा। जिस दिन हर घर, हर गली और हर कार्यस्थल पर महिलाएँ सुरक्षित और सम्मानित महसूस करेंगी, उसी दिन यह कहा जा सकेगा कि भारत सच में एक समानता आधारित समाज है।











