कुछ बातें सामाजिक होती हैं , कुछ धार्मिक तो कुछ आर्थिक लेकिन कुछ बातें ऐसी भी होती हैं जिन पर कोई फ्रेम नहीं चढ़ाया जा सकता क्योंकि वो भीतरी तौर पर इतनी सघनता से जुड़ी होती हैं कि उन्हें एक खांचे में फिट करना लगभग असंभव है। भारतीय समाज में महिलाओं की आजादी समानता और आर्थिक आत्मनिर्भरता भी एक ऐसा ही विषय है जो बाहर से भले ही जुदा दिखे पर भीतरी तौर पर आपस में इतना गड्डमड्ड है कि उसे अलग-अलग देख पाना लगभग असंभव है ।
धरती पर इंसानों का पहला साक्ष्य अफ्रीकी महाद्वीप जिसे पैंजिया द्वीपों के समूह के नाम से जाना जाता है, वहाँ मिलता है और ये माना जाता है कि वहीं से लोग धरती के अलग-अलग हिस्से में गए और एशिया, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और अंत में अमेरिका तक जा बसे। अपनी सुविधा व जरूरतों के हिसाब से देश व समाज का क्रमशः निर्माण किया और उत्तरोत्तर प्रगति और विकास के फलस्वरूप वो आज अपने इस वर्तमान स्वरूप में हमारे सामने है। यहाँ हम अपने इस महान भारत देश की बात करेंगे। जब इंसानों का अस्तित्व इस धरती पर पहली बार नजर आया तो वे स्वतंत्र थे। न कोई धर्म न जाति न वर्ण व्यवस्था और सबसे महत्वपूर्ण ये कि स्त्री- पुरुष का भेद और असमानता भी कहीं नहीं थी। ये सब मानव जनित है। कालांतर में ये जरूर हुआ कि जब समुदाय या मिल – जुलकर रहने की प्रवृत्ति विकसित हुई तो लगभग उसी समय किसी एक व्यक्ति को प्रमुख चुनने की आवश्यकता भी महसूस हुई होगी जिससे कार्य में सुविधा, समन्वय व अनुशासन बन सके। साक्ष्य ये बताते हैं कि जिसे आज भारत देश के नाम से जाना जाता है वहाँ आरंभ में महिलाएं ही घर की प्रमुख मानी जाती थीं और धर्म के नाम पर लोग केवल प्रकृति पूजक थे। धर्म, जाति और वर्ण का तब नामोनिशान भी नहीं था।
आरंभ में हमारी महिलाओं को हर तरह के अधिकार प्राप्त थे मसलन शिकार, युद्ध, खेती-बाड़ी, पढ़ना-लिखना, संगीत–नृत्य आदि आदि पर फिर उनपर कुदृष्टि पड़ी। सत्ता और ताकत की आकांक्षा ने एक षड्यन्त्र रचा और फिर उदय हुआ कुछ ऐसी व्यवस्थाओं का जिसने भारतीय समाज में समानता और आजादी की रीढ़ ही तोड़ दी ।
ये था धर्म का संकीर्ण अर्थों के साथ प्रयोग, जाति व वर्ण व्यवस्था की स्वार्थगत नीति । इसे कब और किसने आरंभ किया? इसकी जरूरत क्यों महसूस हुई? साथ ही इन्हें परंपरागत रूप से आगे बढ़ाने की बाध्यता के साथ ही इनके गुणों और दुर्गुणों को भी समझना आवश्यक है। ये भी सोचना होगा कि महिला प्रधान परिवार से हमारा समाज पुरुष प्रधान कब और क्यों बना?
मेरा मानना है कि लगभग समान समस्या और समान प्रश्न अपनी समस्त विवेचनाओं, उसके परिणाम और मुश्किलात के साथ दुनिया के लगभग हर धर्म और हर समाज में थोड़ा कम तो थोड़ा ज्यादा विद्यमान रहे हैं। कुछ ने इसका निस्तारण अपनी बुद्धिमता और दूरंदेशी से जल्दी कर लिया और मुक्त व विकसित हो गए तो कुछ आज भी उसी की गलीजता में लिपटे हुए हैं और मुक्त होने के लिए छटपटा रहे हैं। यहाँ हम बात वर्तमान भारत देश के बारे में करेंगे। जहां तक मेरी सोच जाती है तो इसके तीन ही मुख्य कारण नजर आते हैं- धर्म, वर्ण और जाति। परम्पराएं और संस्कार इनकी वाहक हैं।
हमें ये भी ध्यान रखना जरूरी है कि एक समय भारत बेहद समृद्ध था। ये मात्र एक देश न होकर छोटे-छोटे अनेक हिस्सों में विभाजित भले ही था पर सबको एक साथ यदि देखा जाए तो हमारी स्थिति-परिस्थिति तुलनात्मक रूप से बेहतर थी । फिर पारसी, यूनानी, शक, हूण, अरब, तुर्क, मुगल और अंग्रेजों के हमले और इनमें भी मुख्य रूप से मुगलों और अंग्रेजों के लंबे शासन काल में गुलामी की प्रवृत्ति ने हम भारतीयों और खासकर भारतीय महिलाओं के सम्मान और स्वतंत्रता पर घातक हमला किया। उनकी सोच, समझ और आजादी को बंदी बनाए रखा जिसका बड़ा और अमानवीय खामियाजा भारतीय महिलाओं को भुगतना पड़ा। साथ ही एक और नई बात हुई। वसुधैव कुटुंबकम की अपनी वैश्विक सोच के कारण जो भी आक्रमणकारी इस देश में आए वो कुछ तो इस देश की सभ्यता और संस्कृति से परिचित हुए, उसे अपनाया तो कुछ हमनें भी उनके यहाँ प्रवास और निवास के परिणाम स्वरूप उन्हें और उनकी संस्कृति को अपनाया।
इसका परिणाम ये हुआ कि कुछ तो हमने इस देश की आत्मा को विस्तार दिया पर कुछ ऐसी चीजें भी अपनाईं जो हमारे हित में नहीं थीं जैसे पर्दा प्रथा या फिर अपनी आजादी का काफी हद तक त्याग। ये कहना भी जरूरी है कि ये न केवल उनके प्रभाव की वजह से बल्कि उनके साथ भी हुआ अर्थात उनकी महिलाओं पर भी ये लागू हुआ जो आगे चलकर इसी भारतीय समाज का एक प्रमुख हिस्सा बनीं।
अब बात उन कारणों की जिसकी वजह से भारतीय महिलायें उन्नति, समानता और आजादी के उस मुकाम से महरूम रहीं जो उनकी पूर्ववर्तियों को प्राप्त था।
सबसे पहले बात धर्म और उसमें भी मुख्य भारतीय धर्म अर्थात मूल सनातन धर्म की तो पहले तो ये स्पष्ट कर दूँ कि हिन्दू धर्म या सनातन धर्म जैसी कोई बात है ही नहीं क्योंकि हमारे ऋषि-मुनियों के अनुसार सनातन पद्धति जीवन को सत्य और परस्पर सम्मान के साथ जीने की विधि भर है परंतु कब और कैसे इसने एक धर्म और उसमें कट्टरता के चरम को आत्मसात कर लिया पता ही नहीं चला। एक बात और जो मैं पूरे गर्व के साथ कहना चाहूँगी कि सनातन धर्म का साहित्य इतना वृहद और विशाल है जिसकी तुलना में विश्व लगभग बौना है उसके बावजूद भी हम अपने समाज में समानता, सम्मान और आजादी को उस तरह प्रतिष्ठित नहीं कर पाए जैसे विश्व के अधिकांश देशों ने कर दिखाया और यही सच बाहरी देशों से आए हुए आक्रमणकारियों की महिलाओं का भी था।
ऋग्वेद काल अर्थात लगभग 1500 ईसा पूर्व या उससे भी पहले वर्ण व्यवस्था का विचार जन्मा और उसे लागू किया गया पर तब ये व्यवस्था जन्म नहीं बल्कि कर्म आधारित थी अर्थात ज्ञान, शिक्षा, यज्ञ, संस्कार, धर्म और आध्यात्मिक कार्यों में जो संलग्न हो वे ब्राह्मण कहलाये। शासन, प्रशासन, सुरक्षा, युद्ध आदि का दायित्व जिसने लिया वे क्षत्रिय कहलाये, कृषि, व्यापार, अर्थव्यवस्था संभालने वाले वैश्य और सेवा, श्रम और उत्पादन से जुड़े कार्य करने वालों को शूद्र कहा गया। इसका जिक्र जरूरी है कि कार्यों के आधार पर उनके मान-सम्मान में कोई विभाजन या अंतर नहीं था बल्कि सभी लगभग समान रूप से सम्माननीय थे।
ये व्यवस्था तकरीबन 900 साल तक चली लेकिन लगभग 600 ईसा पूर्व आते-आते महाजनपद या मौर्य काल में प्रकाश में आई जाति व्यवस्था को इसमें इस तरह से एक साथ घोल दिया गया कि इसने कट्टरता और अमानवीयता के सभी सोपानों को पीछे छोड़ अन्याय का एक नया आयाम ही रच दिया। ये मान लेते हैं कि ये सभी परिवर्तन प्रधानतः तो अच्छे के लिए ही किये गए रहे होंगे फिर ये वर्तमान काल तक आते-आते इतने असुरक्षित, आडंबर पूर्ण और कट्टर कैसे हो गए? तमाम तरह की विसंगतियाँ प्रथाओं की तरह मान्य क्यों हुईं? निश्चित रूप से इसकी समुचित व्यवस्था परंपरा और संस्कार के रूप में की गई जो इसके सबसे समर्थ और ऊर्जावान वाहक हमेशा ही बने रहे। जाति और वर्ण के इस घालमेल ने शोषण और अन्याय की पराकाष्ठा पार कर दी। वर्ण, जाति और लैंगिक असमानता को आधार बनाकर इनके ठेकेदारों ने शूद्रों और समाज के हर वर्ण की स्त्रियों के बीच कोई खास अंतर नहीं रहने दिया।
ये सच है कि उच्च वर्ण की स्त्रियों को कुछ सुविधा जरूर प्राप्त थी पर हर वर्ण व जाति में घर के पुरुषों के आगे उनका महत्व हमेशा नगण्य ही था । उन्हें हमेशा दोयम ही माना गया और किसी भी बाहरी, महत्वपूर्ण और अर्थसंबंधी निर्णयों से उन्हें अलग रखा गया और कई बार तो बेहद जरूरी पारिवारिक मामलों में भी उनसे कोई राय तक नहीं ली गई, बस आदेश दिया गया जिसे जस का तस मानना उनकी विवशता थी। बावजूद इसके भी ढेरों परंपराओं, संस्कारों और रीति-रिवाजों का दायित्व उन पर डाला गया और उनसे ये उम्मीद की गई कि उन्हें पसंद हो या न हो पर उन्हें ये बोझ तो ढोना ही पड़ेगा, परंपराओं, रस्मों और रीति-रिवाजों का वहन तो करना ही पड़ेगा क्योंकि ये उनका कर्तव्य है और इसे धर्म से जोड़ दिया गया ताकि अगर कहीं किसी का जरा भी विरोध या संशय हो तो धर्म के बोझ तले इसे वहीं कुचलकर समूल नष्ट किया जा सके। उनका व्यक्तिगत मान-सम्मान और कुलीनता का आंकलन भी इसी पर निर्भर था। ध्यान देने वाली बात ये भी है कि धर्म का गुरुतर दायित्व तो स्त्रियों पर था पर उन्हें किसी भी धर्म स्थान पर पुजारी नहीं बनाया गया। उन्हें इस महत्व के पद से दूर ही रखा गया।
कौन थे वे लोग और क्यों उनकी इस व्यवस्था को स्त्रियों की भी सामाजिक मान्यता मिली। ध्यान देने वाली बात ये है कि किसी भी समुदाय या व्यक्ति ने इसका विरोध इस हद तक कभी नहीं किया या कर पाए कि इसे खारिज किया जा सके। इस व्यवस्था में शिक्षा और आर्थिक अधिकार से महिलाओं को बड़ी चालाकी और पूरे षड्यन्त्र के साथ दूर कर दिया गया क्योंकि अगर शिक्षा होगी तो हर अन्याय पर प्रश्न होगा और यदि आर्थिक आजादी होगी तो काफी हद तक बिना किसी लैंगिक भेदभाव के पूरी सामाजिक समानता होगी और महिलाओं की पुरुषों पर निर्भरता खत्म हो जाएगी जिससे पुरुषों के मनमाने आचरण और उनके निर्णयों पर अंकुश लग जाएगा। इसे अधिकांशतः पुरुष समाज कभी न तो चाहता था और न ही स्वीकार कर सकता था। अपवाद हर जगह और हर देश काल में रहे परंतु आज भी आप अधिकांशतः पाएंगे कि महिला का समाज में सम्मान तो बहुत है पर शोषण भी उतना ही है साथ ही उसका दर्जा भी दूसरा ही है। उसके हक ओ हुकूक को भी ज्यादातर मजबूरी में ही स्वीकार किया जाता है। इस संदर्भ में ये विचार करिए कि कब और कैसे इस सलाह को किसकी सुविधा या फायदे के लिए और क्यों एक बाध्यता में बदल दिया गया?
कहीं ऐसा तो नहीं था कि ये एक खास किस्म के पक्ष व व्यवस्थित अहम पोषक व विशिष्टताबोध से पीड़ित वर्ग का अपने को महान दिखाने और दूसरे प्रमुख पक्ष को हेय दिखाने के लिए किये गए प्रचार का सुविधाभोगी षड्यन्त्र और कार्य था? ये इस निष्कर्ष तक खतरनाक था कि केवल शक के आधार पर उनकी लगातार प्रताड़ना या हत्या तक हो जाती थी और समाज, सत्ता और व्यवस्थाएं चुप बैठी रहती थीं। उनकी ये चुप्पी इंसानियत के लिए बहुत भारी और बड़ा कलंक साबित हुई।
अब इस बात का विश्लेषण करना सबसे जरूरी है कि ऐसी तमाम धार्मिक पुस्तकें या लेख जिनमें महिलाओं के अधिकारों और कर्तव्यों की व्याख्या है और जो एक तरह से उनपर इस चालाकी और सुगढ़ता से थोपा गया कि वही उन्हें अपना स्वाभाविक धर्म और कर्तव्य लगने लगा और उसी के फलस्वरूप वो पीढ़ियों और सदियों तक लगातार अन्याय, दोहन और प्रताड़ना की शिकार होती रहीं उसका सच और उसकी आवश्यकता भी तब और अब क्या थी और क्या है?
सच तो ये है कि जिस समय इन सारे नियमों और व्यवस्था का निर्माण हुआ उस समय धर्म के चोले और सम्मान के आकर्षण को आधार बनाकर ये छल महिलाओं के जनमानस में बोया गया। धर्म और समाज के ठेकेदारों ने इसे कभी स्नेह, कभी लालच तो कभी दंड के भय से पल्लवित पोषित किया। संस्कार भावना के तहत पीढ़ी दर पीढ़ी ये निर्विरोध चलता रहा। इसमें भी ऐसा नहीं था कि स्त्रियों ने इस असहज और कठिन परंपरा व संस्कारों का विरोध नहीं किया पर फिर उनका जो हश्र हुआ और किया गया वो समाज में पाप और खराब चरित्र का उदाहरण बना जिसका पर्याप्त प्रचार किया गया। इससे यदि किसी के मन में तनिक भी ऐसे विचार आयें तो तुरंत ही वो स्वतः निर्मूल हो सके।
आज हम अपने अतीत पर बहुत गर्व करते हैं पर यदि हमारा समाज समानता के साथ इतना ही प्रबुद्ध व विकसित था तो क्या उनमें एक भी स्त्री ऐसी नहीं थी जिसने अपने विचार जाहिर किये हों या कलमबद्ध किये हों? यदि ऐसा नहीं था तो फिर हमारा सम्पूर्ण गर्व मिथ्या और भ्रम है परंतु यदि ऐसा था तो फिर वो कहाँ है? तमाम धार्मिक पुस्तकें और साहित्य केवल पुरुषों द्वारा ही लिखित है। महिलाओं का लिखा कहाँ है? जितनी भी धार्मिक पुस्तकें हैं उनमें तकरीबन नब्बे प्रतिशत अधिकार पुरुषों को जबकि महिलाओं को भ्रम की तरह मात्र दस प्रतिशत का ही अधिकारी माना गया परंतु नियमित और बोझिल कर्तव्यों का सारा भार स्त्रियों के हिस्से में आया। सभी आर्थिक अधिकार तो पुरुषों के हिस्से पर घर की इज्जत और मान-मर्यादा बनाए रखने की जिम्मेदारी स्त्रियों को सौंपी गई और इस तरह से उनकी उड़ान को तो बाधित किया ही गया साथ ही गलती से सोच भी लें तो कर न सकें इसके लिए उनके पंखों को भी बड़ी निर्ममता से काट दिया गया।
वर्तमान भारत में भी यदि सूक्ष्म निरीक्षण करें तो ऐसे अनेकों उदाहरण मिल जाएंगे। दरअसल इस दौर की महिलाओं के असल ईश्वर तो बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ही हैं जिनके प्रयत्नों से आजाद भारत में पहली बार महिलाओं को पुरुषों के समकक्ष अधिकार मिले। हालांकि ये भी सच है कि समाज को इसे स्वीकारने और अपनाने में काफी वक्त लगा और अब भी ये बहुत जगहों पर केवल कागज पर ही है फिर भी जब कोई कानून हो तो उसका संबल पर्याप्त होता है अधिकारों के अधिग्रहण के लिए। यहाँ पर हम इस बात से जरूर खुश हो सकते हैं कि तमाम विकसित देश भी इस मामले में हमसे पीछे रह गए मसलन अमेरिका में यही अधिकार महिलाओ को 1964 के Civil Rights Act के तहत तो ब्रिटेन को 1970 के Equal Pay Act के तहत मिला पर इसे प्रभावी बनाने में वे हमसे आगे रहे।
अब जबकि संविधान ने हमको समानता के हमारे कानूनी हक ओ हुकूक उपलब्ध करवाए हैं तो ये हमारा नैतिक दायित्व भी है कि हम उसे हासिल कर उनके और खुद के स्वप्नों को पूर्ण करें। ये भी सोचने वाली बात है कि जिस धर्म, जाति या वर्ण व्यवस्था में स्त्रियों के बारे में, उनके अधिकारों और इच्छाओं के बारे में सोचा तक नहीं गया, उनकी रायशुमारी तक नहीं हुई उसे हमें क्यों मानना चाहिए। भले ही वो परंपराओं के रूप में हो, उत्सव, रस्म व व्रत-त्योहार के रूप में हो या फिर किसी भी ऐसे संस्कार के रूप में जो एकपक्षीय है।
वक्त बदल रहा है, सोच परिष्कृत हो रही है पर अब भी एक बहुत लंबा और बीहड़ रास्ता तय करना बाकी है। महिलाओं के अधिकार सुरक्षित रहे इसके लिए महिलाओं को ही जागरूक होना होगा। जब तक महिलाओं के पास आर्थिक आजादी न हो तब तक उनकी समानता, सम्मान और न्याय एक भ्रम ही है क्योंकि आश्रितों का कभी कोई सम्मान नहीं होता। पढ़ा-लिखा वर्ग हालांकि कुछ हद तक इसके पक्ष में है पर उतना ही वो सहयोगी की भूमिका में नहीं होना चाहता जिसको भी सुनिश्चित करने का दायित्व महिलाओं पर है।
उम्मीद है कि धर्म, जाति व वर्ण से परे और ऊपर उठकर तथा परंपराओं और संस्कारों में समय-समय पर लगातार उचित बदलाव करके महिलायें जागरूकता और तार्किकता के साथ अपने अधिकारों को हासिल करेंगी और आगे बढ़ेंगी क्योंकि जिस समाज और देश में पुरुष या महिला दोनों में से किसी एक की भी कार्य सीमा सीमित कर दी जाएगी वहाँ का सर्वागिड़ विकास भी उसी घनत्व में सीमित हो जाएगा ।
इस संबंध में दो महत्वपूर्ण कथन-
“जब तक स्त्रियाँ शिक्षा और स्वतंत्रता नहीं पाएंगी तब तक समाज प्रगति नहीं कर सकता।”
–पंडिता रमाबाई
“स्त्रियों और शूद्रों को शिक्षा से वंचित रखना सबसे बड़ा पाप है ।”
-सवित्रीबाई फुले
-अर्चना राज चौबे, साहित्यकार, नागपुर (महाराष्ट्र)











