संयुक्त राष्ट्र। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा है कि भारत और लैटिन अमेरिकी तथा कैरेबियाई देशों के क्षेत्रीय समूह की यह साझा दिलचस्पी है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के भविष्य को तय करने में ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज अधिक मजबूत हो। उन्होंने यह बात यहां संयुक्त राष्ट्र महासभा से इतर आयोजित भारत-लैटिन अमेरिकी और कैरेबियाई देशों के समुदाय (सीएलएलसी) के विदेश मंत्रियों की बैठक में कही।
जयशंकर ने मंगलवार को अपने संबोधन में कहा कि भारत सीएलएलसी को सिर्फ एक क्षेत्रीय समूह के तौर पर नहीं, बल्कि अधिक प्रतिनिधित्व वाली, संतुलित और समावेशी वैश्विक व्यवस्था को आकार देने में एक बहुत अहम साझेदार के तौर पर देखता है। उन्होंने कहा कि हमें एक-दूसरे से बहुत कुछ सीखना है। हमारे पास एक-दूसरे को देने के लिए बहुत कुछ है और सबसे बड़ी बात यह है कि हमारी साझा दिलचस्पी इस बात में है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के भविष्य को तय करने में ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज मजबूत हो। जयशंकर ने उरुग्वे के विदेश मंत्री मारियो लुबेटकिन के साथ मिलकर भारत-सीएलएलसी के विदेश मंत्रियों की बैठक की सह-अध्यक्षता की। इस बैठक में सीएलएलसी के 30 सदस्य शामिल हुए, जो अब तक का सबसे बड़ा प्रतिनिधिमंडल था।
बैठक में जयशंकर ने कहा कि भारत, चिली के साथ प्रस्तावित व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता, पेरू के साथ मुक्त व्यापार समझौता और ‘मकॉसुर’ के साथ वरीयता प्राप्त व्यापार समझौता के विस्तार के जरिए सीएलएलसी क्षेत्र के साथ ‘मजबूत और संतुलित’ आर्थिक साझेदारी बनाने की कोशिश कर रहा है। मकॉसुर दक्षिण अमेरिका का एक प्रमुख क्षेत्रीय व्यापार संगठन और आर्थिक खंड है जिसकी स्थापना 26 मार्च 1991 को असंसियन की संधि के माध्यम से हुई थी। जयशंकर ने कहा कि हमारा मकसद ऐसे ढांचे तैयार करना है जो दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद हों। हम एक-दूसरे की संवेदनाओं और प्राथमिकताओं का ध्यान रखते हुए तेजी से आगे बढ़ना चाहते हैं। सीएलएलसी एक क्षेत्रीय मंच है जो सभी लैटिन अमेरिकी और कैरेबियाई सभी देशों को एक साथ लाता है।
जयशंकर ने भारत और सीएलएलसी देशों के बीच व्यापार एवं विकास के सहयोग को और मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया। इसमें विकास और साझेदारी के लिए प्रशिक्षण और मानव संसाधन को एक पुल के तौर पर इस्तेमाल करना, और डिजिटल स्पेस, एआई और नवोन्मेष के क्षेत्र में मौकों का लाभ उठाना शामिल है। जयशंकर ने कहा कि ‘ग्लोबल साउथ’ के साथ भारत का जुड़ाव उसके राष्ट्रीय हितों से आगे बढ़कर है और यह साझा समृद्धि के प्रति उसकी एकजुटता तथा प्रतिबद्धता को दर्शाता है।















