लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की अध्यक्ष मायावती ने गुरुवार को स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनकी पार्टी अब किसी भी राजनीतिक दल से गठबंधन नहीं करेगी और आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव बसपा अपने दम पर लड़ेगी। राजधानी लखनऊ में बसपा संस्थापक कांशीराम के 19वें परिनिर्वाण दिवस पर आयोजित एक बड़े कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने अपने पिछले राजनीतिक अनुभवों को साझा किया और सपा तथा कांग्रेस दोनों पर तीखा हमला बोला। मायावती ने कहा कि अतीत में हुए गठबंधनों ने बसपा को कोई फायदा नहीं दिया, बल्कि पार्टी के मूल वोट बैंक को नुकसान ही पहुंचाया।
मायावती ने कहा कि जब भी बसपा ने गठबंधन किया, उसके वोट सहयोगी दलों को एकतरफा ट्रांसफर हो गए, लेकिन जातिवादी मानसिकता के कारण अन्य दलों का वोट बसपा उम्मीदवारों को नहीं मिला। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि 1993 में समाजवादी पार्टी से गठबंधन के बावजूद बसपा केवल 67 सीटें जीत सकी। 1996 में कांग्रेस से गठबंधन करने पर भी यही आंकड़ा रहा। वहीं, 2002 में जब बसपा ने अकेले दम पर चुनाव लड़ा, तो पार्टी ने लगभग 100 सीटें जीतीं, और 2007 में अकेले लड़कर पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई, जो पूरे पांच साल तक चली। मायावती ने कहा कि गठबंधन सरकारें कभी स्थायी नहीं होतीं और न ही उनमें बहुजन समाज के लोगों का उत्थान संभव होता है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि, “अब तक के अनुभवों के आधार पर बसपा ने तय किया है कि वह उत्तर प्रदेश विधानसभा का अगला चुनाव अपने बलबूते पर ही लड़ेगी।”
बसपा प्रमुख ने अपने संबोधन में समाजवादी पार्टी (सपा) पर सबसे तीखा हमला बोला। उन्होंने सपा को “दोगली राजनीति” करने वाली पार्टी बताते हुए कहा कि सत्ता में रहते हुए सपा नेताओं को दलित महापुरुषों और बहुजन प्रतीकों की याद नहीं आती, लेकिन सत्ता से बाहर होते ही वे उनके नाम पर कार्यक्रम आयोजित करने लगते हैं। मायावती ने कहा, “सपा के लोग दो-तीन दिन पहले मीडिया में यह खबर छपवा रहे थे कि वे मान्यवर श्री कांशीराम जी के सम्मान में संगोष्ठी करेंगे। लेकिन जब वे सत्ता में रहते हैं, तब न तो कांशीराम जी की जयंती याद रहती है, न पुण्यतिथि। यह इनका दोहरा चरित्र है।”
मायावती ने सपा पर आरोप लगाया कि उसने उनकी सरकार द्वारा कांशीराम जी के नाम पर बनाए गए कई संस्थानों और जिलों के नाम बदल दिए। उन्होंने कहा कि बसपा सरकार ने अलीगढ़ मंडल में नया जिला बनाकर उसका नाम कांशीराम नगर रखा था, लेकिन सत्ता में आने के बाद सपा ने उसका नाम बदल दिया। उन्होंने कहा कि सपा सरकार ने बसपा शासन की जनहितकारी योजनाओं को बंद कर दिया और दलित महापुरुषों के स्मारकों के प्रति उदासीन रवैया अपनाया। मायावती ने बहुजन समाज को आगाह करते हुए कहा कि, “ऐसे दोगले लोगों से सावधान रहना जरूरी है, जो सत्ता में रहकर बहुजनों की उपेक्षा करते हैं और सत्ता से बाहर आने पर उनके नाम पर राजनीति करते हैं।”
कांग्रेस पर भी निशाना साधते हुए मायावती ने कहा कि इस पार्टी ने हमेशा दलितों और पिछड़ों के साथ अन्याय किया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर को न तो लोकसभा में भेजा, न ही उनके निधन पर राष्ट्रीय शोक घोषित किया। इतना ही नहीं, बसपा संस्थापक कांशीराम के निधन पर भी कांग्रेस ने सम्मान स्वरूप एक दिन का शोक नहीं मनाया। मायावती ने कहा कि मंडल आयोग की सिफारिशें और आंबेडकर को ‘भारत रत्न’ का सम्मान बसपा के लगातार संघर्ष का परिणाम था, न कि कांग्रेस की किसी नीति का।
अपने भाषण में मायावती ने योगी आदित्यनाथ सरकार की भी सराहना की और कहा कि भाजपा सरकार ने बसपा शासन में बनाए गए स्मारकों और उद्यानों के रखरखाव के लिए टिकटों से मिलने वाले राजस्व का सही उपयोग किया है। उन्होंने कहा कि, “जब सपा की सरकार थी, तब इस पैसे को दबा दिया गया था, एक भी रुपया स्मारकों की मरम्मत पर नहीं खर्च किया गया। लेकिन वर्तमान भाजपा सरकार ने हमारे आग्रह पर इन स्थलों की मरम्मत का पूरा खर्च वहन किया। इसके लिए बसपा राज्य सरकार की आभारी है।”
मायावती ने कहा कि बसपा का उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि बहुजन समाज का सर्वांगीण विकास है। उन्होंने कहा कि अन्य पार्टियां जनता को भ्रमित करने के लिए घोषणाएं और शिलान्यास तो करती हैं, लेकिन उनका धरातल पर कोई असर नहीं होता। उन्होंने बसपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों से अपील की कि वे संगठन को मजबूत करें ताकि बसपा एक बार फिर बहुमत से सत्ता में आए। उन्होंने कहा कि “आंबेडकर और कांशीराम का सपना तभी पूरा होगा जब बसपा पूर्ण बहुमत से सरकार बनाएगी और बहुजन समाज को आत्मनिर्भर बनाएगी।”










