दीपावली की रोशनी के लिए पेड़ों का इस्तेमाल, बड़े ज्वेलर्स की ओर से पर्यावरण नियमों की अनदेखी
लोकवाहिनी, संवाददाता
नागपुर। दीपावली का त्योहार आते ही खरीदारी, आकर्षक सजावट और रोशनी की जगमगाहट का माहौल बन जाता है। गरीब हो या अमीर, हर कोई अपनी क्षमता के अनुसार दिवाली की खुशियां दोगुनी करने के लिए खरीदारी को प्राथमिकता देता है। ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए छोटे-बड़े व्यापारी अपने प्रतिष्ठानों को आकर्षक ढंग से सजाते हैं। विशेष रूप से सोने-चांदी के आभूषण और कीमती रत्न बेचने वाले बड़े ज्वेलर्स के बीच इस दौरान रोशनी और सजावट की होड़ देखने को मिलती है। करोड़ों के राशि रत्न और चमकदार पत्थर बेचकर ग्राहकों का भविष्य उज्ज्वल करने का दावा करने वाले इन्हीं व्यापारियों की ओर से प्रकृति के भविष्य को ही खतरे में डाला जा रहा है। पश्चिम नागपुर में इसका चिंताजनक नजारा देखने को मिल रहा है।
वर्तमान में नागपुर शहर के कई ज्वेलर्स की दुकानों के सामने फुटपाथ पर लगे बड़े-बड़े हरे-भरे पेड़ों को बिजली की झालरों से पूरी तरह लपेट दिया गया है। शाम होते ही इन पेड़ों पर की गई रोशनी से पूरा परिसर जगमगा उठता है। ग्राहकों का ध्यान आकर्षित करने के लिए की गई यह सजावट पहली नजर में भले ही आकर्षक लगे, लेकिन इसकी कीमत शहर के अनमोल पेड़ों को चुकानी पड़ रही है। विशेष रूप से पश्चिम नागपुर के कुछ बड़े ज्वेलर्स द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर लगे पेड़ों का इस्तेमाल रोशनी और व्यावसायिक प्रचार के लिए किए जाने का नजारा सामने आ रहा है। सवाल केवल रोशनी का नहीं, बल्कि सार्वजनिक संपत्ति और पर्यावरण के संरक्षण का भी है। सड़क किनारे या फुटपाथ पर लगे पेड़ किसी भी व्यापारी की निजी संपत्ति नहीं होते। वे शहर की प्राकृतिक धरोहर और नागरिकों की सामूहिक संपत्ति हैं। ऐसे में ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए इन पेड़ों का इस्तेमाल करने का अधिकार संबंधित दुकानदारों को किसने दिया?
पेड़ों के संरक्षण की जिम्मेदारी संभालने वाली नागपुर महानगरपालिका के अधिकारी यह सब खुलेआम देख रहे हैं, फिर भी कार्रवाई क्यों नहीं कर रहे हैं? यह सवाल उठ रहा है। पेड़ केवल सजावट की वस्तु नहीं हैं। उनका अपना जैविक चक्र, प्राकृतिक विकास की प्रक्रिया और पर्यावरण में महत्वपूर्ण योगदान होता है। मनुष्यों की तरह ही पेड़-पौधों के लिए भी दिन और रात का प्राकृतिक चक्र जरूरी है। रात के समय कृत्रिम रोशनी पेड़ों की जैविक घड़ी को प्रभावित कर सकती है। रोशनी की तीव्रता और उसकी अवधि के अनुसार उनके फूलने, पत्तियां झड़ने और विकास की प्रक्रिया में बदलाव आ सकता है। इसके अलावा, पेड़ों पर कई पक्षियों, गिलहरियों, कीटों और छोटे जीवों का बसेरा होता है। रात के समय तेज कृत्रिम रोशनी से पक्षियों के आराम करने और उनकी आवाजाही की प्राकृतिक गतिविधियों में बाधा उत्पन्न होती है। रात में सक्रिय रहने वाले कई कीटों की दिशा पहचानने की क्षमता भी रोशनी से प्रभावित होती है। विशेष रूप से परागण करने वाले रात्रिचर कीटों की प्राकृतिक गतिविधियों में कृत्रिम रोशनी से व्यवधान पैदा हो सकता है। इसलिए पेड़ों पर की जाने वाली रोशनी केवल पेड़ों तक सीमित समस्या नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण स्थानीय जैवविविधता से जुड़ा मामला है। विद्युत रोशनी की सजावट करते समय पेड़ों के तनों और शाखाओं पर तार लपेटे जाते हैं।













