गुवाहाटी: असम सरकार के 1983 के कुख्यात नेल्ली नरसंहार पर तिवारी आयोग की रिपोर्ट को आगामी विधानसभा सत्र में पेश करने के निर्णय ने राज्य में राजनीतिक और सामाजिक बहस छेड़ दी है। मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा ने बृहस्पतिवार को कहा था कि राज्य मंत्रिमंडल ने इस रिपोर्ट को नवंबर में होने वाले विधानसभा सत्र में पेश करने का फैसला किया है।
हालांकि, इस कदम की आलोचना करते हुए नेता प्रतिपक्ष देवब्रत सैकिया ने शनिवार को कहा कि यह फैसला समुदायों के बीच शांति को खतरे में डाल सकता है। सैकिया ने कहा, “यह घटना लगभग 43 साल पुरानी है। जब जख्म भर ही गए हैं, तो इसे फिर से क्यों खोला जा रहा है? क्या विधानसभा चुनाव से पहले लोगों को भड़काने के लिए ऐसा किया जा रहा है?”
नेल्ली (मोरीगांव) क्षेत्र में 18 फरवरी 1983 को लगभग 16 गांवों में असमिया हिंदुओं और स्थानीय आदिवासियों ने बांग्ला भाषी मुस्लिम समुदाय पर हमला किया, जिसमें छह घंटे में 2,100 से अधिक लोग मारे गए। इसके बाद असम सरकार ने 14 जुलाई 1983 को टी.पी. तिवारी की अध्यक्षता में आयोग बनाया। आयोग की 551 पृष्ठों की रिपोर्ट मई 1984 में तत्कालीन हितेश्वर सैकिया सरकार को सौंपी गई थी, लेकिन इसे कभी सार्वजनिक नहीं किया गया।
विरोध के बीच ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) ने सरकार का समर्थन किया और कहा कि इतने लंबे समय तक रिपोर्ट को छिपाकर रखना सही नहीं था।
फिल्म निर्माता पार्थजीत बरुआ, जिन्होंने नरसंहार पर फीचर फिल्म ‘द नेल्ली स्टोरी’ बनाई है, ने कहा, “ऐसे समय में रिपोर्ट पेश करना, जब पूरा राज्य हाल ही में गर्ग की मौत पर शोक मना रहा है, आश्चर्यजनक और निराशाजनक है। इस फैसले से गर्ग की मौत पर ध्यान भटक सकता है। अभी समय बिल्कुल अनुकूल नहीं है।”
राज्य में राजनीतिक और सामाजिक हलचल जारी है, और आने वाले विधानसभा सत्र में रिपोर्ट पेश करने के फैसले को लेकर बहस तेज होने की संभावना है।
नेता प्रतिपक्ष और विश्लेषकों का कहना है कि रिपोर्ट सार्वजनिक करने के कदम से यदि सावधानी नहीं बरती गई तो समुदायों के बीच विश्वास और सामाजिक संतुलन पर असर पड़ सकता है।
नोट: नेल्ली नरसंहार असम आंदोलन के दौरान घटी सबसे संवेदनशील घटनाओं में से एक माना जाता है, और इसके दस्तावेजीकरण और रिपोर्टिंग को लेकर लंबे समय से विवाद चला आ रहा है।












