पुलिस में शिकायत दर्ज कराई जाएगी
लोकवाहिनी, संवाददाता
मुंबई। एमपीएससी के ड्रग इंस्पेक्टर पद की भर्ती परीक्षा का प्रश्नपत्र परीक्षा से दो दिन पहले लीक होने की खबर सामने आई थी, जिससे भारी हंगामा मच गया था. शरद पवार गुट के नेता और विधायक रोहित पवार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पेपर लीक मामले पर टिप्पणी करते हुए आरोपियों पर कार्रवाई की मांग की थी. लेकिन अब इस मामले में बड़ा मोड़ आया है. ड्रग इंस्पेक्टर पद का पेपर लीक हुआ ही नहीं था. सूत्रों के अनुसार किसी ने फर्जी ईमेल भेजा था. अब सभी की नजर इस बात पर है कि एमपीएससी इस फर्जी शिकायत करने वालों पर क्या कार्रवाई करेगी. अब सामने आया है कि एमपीएससी परीक्षा के पेपर लीक होने की शिकायत झूठी थी. कथित रूप से लीक हुए पेपर का ड्रग इंस्पेक्टर परीक्षा से कोई संबंध नहीं था. शिकायतकर्ताओं के आरोप मनगढ़ंत थे. गौरव पाटिल और लोकेश पाटिल ने ईमेल के माध्यम से एमपीएससी को इसकी जानकारी दी है. दोनों ने कल रात एमपीएससी को ईमेल कर बताया कि शिकायत झूठी थी. पेपर लीक होने से इसका कोई संबंध नहीं था. यह एक साजिश थी. जो पेपर लीक हुआ था वह किसी स्थानीय परीक्षा का था, ऐसा ईमेल में कहा गया है.
यह भी सामने आया है कि दोबारा परीक्षा जल्द न हो, इसलिए यह साजिश रची गई थी. इससे यह भी स्पष्ट हो गया कि पेपर लीक मामले में रोहित पवार के आरोप निराधार थे. दिनांक 22 मार्च 2026 को आयोजित ड्रग इंस्पेक्टर परीक्षा का पेपर 20 मार्च 2026 को व्हाट्सऐप पर वायरल हुआ था और उसी के आधार पर गौरव पाटिल/लोकेश पाटिल तथा ऋषिकेश गांगर्ड ने शिकायत की थी कि पेपर लीक हुआ है. इस संबंध में आगे जांच करने पर मेरे संज्ञान में आया कि 20 मार्च को व्हाट्सऐप पर प्रसारित तथाकथित प्रश्नपत्र आयोग की मूल प्रश्नपत्रिका से बिल्कुल अलग था. आयोग की 22 मार्च 2028 की प्रश्नपत्रिका किसी भी परिस्थिति में लीक नहीं हुई थी. ऋतुजा और मैंने मजाक में कहा था कि यही आयोग की मूल प्रश्नपत्रिका है. लेकिन वास्तव में ऋतुजा को वह प्रश्नपत्रिका मिली ही नहीं थी. 20 मार्च 2026 को भेजी गई प्रश्नपत्रिका आयोग की नहीं बल्कि किसी अन्य टेस्ट सीरीज (एसवी) की थी. आयोग की बदनामी करने का हमारा कोई उद्देश्य नहीं था. लेकिन ऋषिकेश गांगर्ड ने इसका गलत अर्थ निकालकर बड़े पैमाने पर इसे प्रसारित किया और सोशल मीडिया पर घोषणा कर दी कि आयोग का पेपर लीक हो गया है. 22 मार्च को परीक्षा होने के बाद उन्हीं प्रश्नों को टाइप करके यह अफवाह फैलाई गई कि यही प्रश्नपत्रिका ऋतुजा ने 20 मार्च 2028 को भेजी थी. क्योंकि ऋषिकेश गांगर्ड स्वयं परीक्षा में असफल हो गया था और उसे लगा कि भविष्य में जल्द ड्रग इंस्पेक्टर की भर्ती नहीं निकलेगी, इसलिए उसने परीक्षा दोबारा कराने के उद्देश्य से पेपर लीक होने की अफवाह फैलाई. आयोग, उसके माननीय सचिव या माननीय अध्यक्ष के खिलाफ मेरी कोई शिकायत नहीं है.
इन सबूतों के आधार पर जांच जारी है और आज, 27 जुलाई को, शिकायतकर्ता तथा जिस उम्मीदवार को लाभ मिलने का आरोप लगाया गया था, उन दोनों को आयोग के कार्यालय में पूछताछ के लिए बुलाया गया था. लेकिन आज दोनों ही अनुपस्थित रहे. हमने इस मामले को गंभीरता से लिया है और आरोपों तथा सबूतों की गहन जांच करेंगे. साथ ही संबंधित मामले में पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई जाएगी.
हर्षवर्धन सपकाल ने क्या आरोप लगाए?
महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र व्हाट्सऐप पर प्रसारित होने, अंकों के आवंटन में कथित गड़बड़ियों और साक्ष्यों के साथ शिकायतें सामने आने के बावजूद सरकार और संबंधित तंत्र चुप हैं. सपकाल ने आरोप लगाया कि लाखों छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय उन्हें संरक्षण दिया जा रहा है. उन्होंने सवाल किया कि आखिर कथित पेपर लीक रैकेट किसके संरक्षण में चल रहा है और सरकार के किस मंत्री के आशीर्वाद से ऐसी गतिविधियां हो रही हैं.
एमपीएससी ने क्या कहा?
पेपर लीक के आरोपों के बाद एमपीएससी के आयुक्तों ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की. इस दौरान आयुक्तों ने कहा कि खाद्य एवं औषधि प्रशासन संवर्ग के 154 पदों के लिए 22 मार्च 2026 को राज्य के 6 संभागीय मुख्यालयों में ऑफलाइन माध्यम से परीक्षा आयोजित की गई थी. इस परीक्षा का परिणाम 12 जून 2026 को घोषित किया गया था. 1 जुलाई से 22 जुलाई के बीच पात्र 488 उम्मीदवारों के साक्षात्कार लिए गए. साक्षात्कार के अंतिम दिन, यानी 22 जुलाई को, पात्र उम्मीदवारों की अस्थायी सूची घोषित की गई थी. 21 जुलाई को गौरव पाटिल नाम की ईमेल आईडी से 22 मार्च को हुई परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होने और उसका लाभ एक उम्मीदवार को मिलने की शिकायत आयोग के कार्यालय को प्राप्त हुई थी. उस समय शिकायत में पर्याप्त सबूत न होने के कारण संबंधित व्यक्ति को अतिरिक्त सबूत प्रस्तुत करने के लिए कहा गया था. इसके बाद गौरव पाटिल ने आयोग के कार्यालय में ईमेल के माध्यम से ये सबूत प्रस्तुत किए थे.











