अकोला का प्राचीन कावड़ महोत्सव उत्साह के साथ मनाया
लोकवाहिनी संवाददाता
अकोला। श्रावण मास के अनोखे और भव्य आयोजनों में शामिल अकोला का प्राचीन कावड़ महोत्सव इस वर्ष भी पूरे उत्साह और भक्तिभाव के साथ मनाया गया। मध्य भारत के सबसे बड़े कावड़ महोत्सव के रूप में अपनी अलग पहचान बना चुके इस आयोजन में महाराष्ट्र सहित देशभर के शिवभक्त बड़ी संख्या में शामिल हुए। अंतिम श्रावण सोमवार के अवसर पर हजारों कावड़ों में पूर्णा नदी का जल भरकर अकोला के आराध्य देवता श्री राजराजेश्वर का जलाभिषेक किया गया।
‘हर-हर महादेव’ के जयघोष और ढोल-ताशों की गूंज से पूरा शहर भक्तिमय हो गया। सुबह से ही गांधीग्राम से अकोला की ओर कावड़धारियों के जत्थे पहुंचते रहे। अकोला के पारंपरिक कावड़ और पालकी महोत्सव को 82 वर्षों की गौरवशाली परंपरा प्राप्त है। इस अवसर पर हजारों श्रद्धालु कावड़ में नदी का पवित्र जल लेकर श्री राजराजेश्वर मंदिर पहुंचते हैं और भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। इस वर्ष करीब 140 पालकी और 350 से अधिक कावड़ मंडल महोत्सव में शामिल हुए हैं। अकोला से लगभग 21 किलोमीटर दूर गांधीग्राम (वाघोली) स्थित पूर्णा नदी से जल भरकर शिवभक्त भव्य कावड़ लेकर शहर में पहुंचे। गांधीग्राम से अकोला तक सड़क पर एक के बाद एक कावड़ मंडलों की लंबी कतार दिखाई दी। विभिन्न आकार और सजावट वाली कावड़ें श्रद्धालुओं और नागरिकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी रहीं।
जगह-जगह हुआ कावड़धारियों का स्वागत
गांधीग्राम से राजराजेश्वर मंदिर तक के मार्ग पर विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और स्वयंसेवी संस्थाओं की ओर से कावड़धारी शिवभक्तों का जगह-जगह स्वागत किया गया। ढोल-ताशों की गूंज, गुलाल और ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष के बीच शिवभक्त कई क्विंटल भार वाली कावड़ अपने कंधों पर लेकर उत्साह के साथ आगे बढ़ते रहे। पूरे मार्ग पर भक्तिमय वातावरण बना रहा। कावड़ और पालकी महोत्सव में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के शामिल होने को देखते हुए पुलिस प्रशासन की ओर से सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए। गांधीग्राम से राजराजेश्वर मंदिर तक के पालकी मार्ग पर पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई, ताकि महोत्सव शांतिपूर्ण और व्यवस्थित तरीके से संपन्न हो सके। अकोला का यह ऐतिहासिक कावड़ महोत्सव एक बार फिर धार्मिक आस्था, परंपरा और सामाजिक एकजुटता का भव्य उदाहरण बनकर सामने आया।
11 से लेकर हजार कलश वाली कावड़
कावड़ महोत्सव में छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर आयु वर्ग के श्रद्धालु उत्साह के साथ शामिल हुए। इस वर्ष 11 कलश से लेकर हजार कलशों तक की कावड़ें महोत्सव में देखने को मिली। सबसे बड़ी कावड़ लाने को लेकर विभिन्न मंडलों में भी उत्साह और प्रतिस्पर्धा देखने को मिली। डाबकी रोडवासी मित्र मंडल, हरिहरपेठ के जय भवानी मित्र मंडल, हरिहर शिवभक्त मंडल और जय बामलेश्वर शिवभक्त मंडल की हजारों कलश वाली कावड़ ने विशेष आकर्षण पैदा किया। कावड़ मंडलों की ओर से भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों पर आधारित आकर्षक झांकियां भी तैयार की गई। इनमें बाबा अमरनाथ, त्र्यंबकेश्वर, भैरवनाथ, राजराजेश्वर और ओंकारेश्वर सहित विभिन्न धार्मिक स्वरूपों को प्रदर्शित किया गया। पानी से भरे कलश को बांस से तैयार किए गए ढांचे पर लटकाकर श्रद्धालु उन्हें कंधों पर उठाकर राजराजेश्वर मंदिर तक ले गए। मंदिर पहुंचने के बाद इन्हीं कलशों में लाए गए जल से भगवान शिव का जलाभिषेक किया गया।













