दो टूक : संशोधित फॉर्म 6 पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के दावे को लेकर रुख किया साफ
लोकवाहिनी, संवाददाता
नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को साफ किया कि उसने नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए चुनाव आयोग के संशोधित फॉर्म 6 पर न तो कोई फैसला दिया है और न ही उसे मंजूरी दी है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े मामले में फैसला सुनाते समय संशोधित फॉर्म उसके सामने था ही नहीं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज और फॉर्म 6 में किए गए बदलावों को लेकर दायर नई याचिका पर सुनवाई के दौरान यह स्पष्टीकरण दिया। संशोधित फॉर्म में नए मतदाता के रूप में पंजीकरण कराने वाले आवेदकों को यह बताना होता है कि वे या उनके माता-पिता पिछले एसआईआर में शामिल थे या नहीं।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने पांच अक्टूबर को स्पष्ट किया था कि संशोधित फॉर्म 6 को अदालत ने मंजूरी नहीं दी है। वहीं, चुनाव आयोग का दावा था कि संशोधित घोषणा-पत्र को शीर्ष अदालत की स्वीकृति मिली हुई है। इस पर न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने नए फॉर्म 6 पर कोई फैसला नहीं दिया है। बिहार एसआईआर मामले में फैसला सुनाए जाने के समय संशोधित फॉर्म अस्तित्व में ही नहीं था। उन्होंने स्पष्ट किया, ‘नए फॉर्म 6 पर कोई न्यायिक फैसला नहीं हुआ है।’ अदालत ने कहा कि उसकी पिछली मौखिक टिप्पणियों को संशोधित घोषणा-पत्र की मंजूरी या अस्वीकृति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश ने मीडिया रिपोर्टिंग को लेकर भी सावधानी बरतने को कहा। उन्होंने कहा, कृपया खबरों के लिए चुनिंदा शब्द न उठाएं। फॉर्म 6 को लेकर विवाद तब बढ़ा, जब चुनाव आयोग ने 26 सितंबर को एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की। इसमें संकेत दिया गया था कि बिहार में एसआईआर से संबंधित मई 2026 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने संशोधित घोषणा-पत्र को बरकरार रखा था। हालांकि, संशोधित घोषणा-पत्र फैसले के बाद लागू किया गया था। ऐसे में बिहार एसआईआर मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को इसके प्रावधानों की जांच करने का अवसर नहीं मिला था।
कैंसर की दवाओं पर 30% मार्जिन कैप लगाएगी सरकार
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि कैंसर की दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को रेगुलेट करने का फैसला किया है, ताकि ज्यादा मार्कअप को रोका जा सके और साथ ही उचित मार्जिन भी सुनिश्चित किया जा सके। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि केंद्र सरकार उन कैंसर दवाओं की एक सूची जारी करेगी, जिन पर 30 प्रतिशत ट्रेड मार्जिन की सीमा लागू होगी। उन्होंने कोर्ट को बताया कि बाजार के हालात और सार्वजनिक स्वास्थ्य की जरूरतों के आधार पर इस लिस्ट को समय-समय पर अपडेट किया जाएगा और इसमें नई दवाएं जोड़ी जाएंगी, जबकि सस्ती दवाओं को इससे बाहर रखा जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं की कीमतों की व्यापक जांच की जरूरत पर जोर दिया और कहा कि यह प्रक्रिया सिर्फ कैंसर-रोधी दवाओं तक ही सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि पूरे फार्मास्युटिकल बाजार पर लागू होनी चाहिए।













