लोकवाहिनी संवाददाता:भंडारा। भंडारा जिला में तापमान 42 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंचने से भीषण गर्मी और तेज वाष्पीकरण के कारण जलसंकट गहरा गया है। जिले के सिंचाई, पेयजल और अन्य उपयोगों के लिए महत्वपूर्ण 63 छोटे-बड़े जलप्रकल्पों में अब केवल 42 प्रतिशत उपयोगी जलसंग्रह शेष बचा है। पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 88.84 प्रतिशत था। ऐसे में इस वर्ष जलसंग्रह आधे से भी कम रह जाने से प्रशासन, किसानों और ग्रामीणों की चिंता बढ़ गई है।
अभी अप्रैल माह आधा भी नहीं बीता है, लेकिन जलसंग्रह में आई भारी गिरावट ने आने वाले मई और जून महीनों में गंभीर जलसंकट की आशंका पैदा कर दी है। यदि यही स्थिति बनी रही तो जिले में पेयजल और सिंचाई दोनों पर बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।
जिले के चार मध्यम सिंचाई प्रकल्पों की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक बताई जा रही है। इन परियोजनाओं में औसतन केवल 28.64 प्रतिशत पानी शेष है, जबकि पिछले वर्ष इसी समय यह जलसाठा 80 प्रतिशत से अधिक था। इन चारों परियोजनाओं में सबसे खराब स्थिति बघेड़ा परियोजना की है, जहां मात्र 9.36 प्रतिशत पानी बचा है। इसके अलावा चांदपुर परियोजना में 28.74 प्रतिशत, बेटेकर बोधाली परियोजना में 31.53 प्रतिशत और सोरना परियोजना में 41.48 प्रतिशत जलसाठा शेष है।
जलसंग्रह में आई इस कमी का सीधा शहर में असर
खरीफ पूर्व की खेती और गर्मी की फसलों पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। किसानों का कहना है कि फसलों के अंतिम सिंचन के समय ही परियोजनाओं का पानी तेजी से समाप्त हो रहा है, जिससे उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और भी गंभीर होती जा रही है। गांवों तथा खेतों की कई कुओं का जलस्तर तेजी से नीचे चला गया है। कुछ उथले कुएं तो अप्रैल के शुरुआती दिनों में ही सूख गए हैं। छोटे तालाबों और बोडियों के सूखने से पशुओं के लिए पानी की समस्या भी गंभीर बनने लगी है।
जिले के 28 पूर्व मालगुजारी, यानी ‘मामा तालाबों’ की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। इनमें औसतन 51.98 प्रतिशत जलसंग्रहण बचा है। कुंभीली जलाशय में केवल 19.67 प्रतिशत पानी शेष है, जबकि पिंपलगांव जलाशय में 94.17 प्रतिशत पानी उपलब्ध होने से उस क्षेत्र को कुछ राहत मिली है।
हिवरा परियोजना पूरी तरह सूखा जिले के 31 लघु सिंचाई प्रकल्पों की स्थिति भी लगातार बिगड़ रही है। इनमें अभी केवल 47.94 प्रतिशत पानी बचा है और 20 परियोजनाओं का जलस्तर 50 प्रतिशत से नीचे चला गया है। हिवरा परियोजना पूरी तरह सूख चुकी है, जबकि सिल्ली-अंबाडी परियोजना में अभी 95.88 प्रतिशत पानी उपलब्ध है। हालांकि, लगातार बढ़ते तापमान और तेज वाष्पीकरण को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि अगले कुछ सप्ताह में स्थिति और गंभीर हो सकती है। यदि समय रहते वैकल्पिक जल प्रबंधन नहीं किया गया तो पूरे जिले में पानी का संकट गहरा सकता है।







