नागपुर। जल संसाधन विभाग ने 1970 के नियमों के अनुसार कार्यकारी अभियंता पद पर पदोन्नत किए गए 55 अधिकारियों को 1983 के पदोन्नति नियमों के अनुसार 1985 में पदावनत कर दिया था। साथ ही, कार्यकारी अभियंता पद से अधीक्षक अभियंता पद पर पदोन्नत किए गए एक अधिकारी को भी पदावनत किया गया।
कार्यकारी अभियंता पद पर पदावनति आदेश को चुनौती देने वाली 15 रिट याचिकाएं 1985 में उच्च न्यायालय ने खारिज कर दीं और उच्च न्यायालय के इस आदेश को चुनौती देने वाली 9 विशेष अनुमति याचिकाएं भी सर्वोच्च न्यायालय की पांच न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने 1990 में खारिज कर दी थीं। सर्वोच्च न्यायालय ने इसी निर्णय में कार्यकारी अभियंता पद पर पदोन्नति के लिए 1970 के नियमों का उपयोग जारी रखने की मांग भी अस्वीकार कर दी। साथ ही, 1983 के नियमों की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका भी खारिज कर दी गई। इसलिए, कार्यकारी अभियंता पद पर पदोन्नति और सेवा वरिष्ठता के लिए 1970 के नियमों का उपयोग समाप्त हो गया और 1983 के वैध नियमों के अनुसार पदोन्नति तथा सेवा वरिष्ठता निर्धारित की जानी चाहिए, इस बात पर सर्वोच्च न्यायालय की पांच न्यायाधीशों वाली पीठ ने मुहर लगा दी थी।
यदि कार्यकारी अभियंता पद पर पदोन्नति के लिए श्रेणी-1 संवर्ग के अधिकारी अब 1970 के नियमों का उपयोग शुरू कर रहे हैं, तो 1985 में जिन्हें 1983 के पदोन्नति नियमों के अनुसार पदावनत किया गया था, उन अधिकारियों अथवा उनके परिवारों को क्या 1970 के नियमों के अनुसार सभी लाभ दिए जाएंगे? क्या श्रेणी-1 शाखा के वर्तमान अधिकारियों को सर्वोच्च न्यायालय की पांच न्यायाधीशों वाली पीठ का 1990 का आदेश स्वीकार नहीं है?
जल संसाधन विभाग ने पदावनत किए गए 55 कार्यकारी अभियंताओं में से 23 कार्यकारी अभियंताओं के 1983 के नियमों के अनुसार संशोधित पदोन्नति आदेश 1993 में जारी किए। इस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका महाराष्ट्र प्रशासनिक अधिकरण, मुंबई पीठ ने 1999 में खारिज कर दी थी। इसमें याचिकाकर्ताओं द्वारा 1970 के नियमों के अनुसार जारी किए गए उनके पदोन्नति आदेशों को कायम रखने की मांग भी अस्वीकार कर दी गई थी।
जल संसाधन विभाग ने कार्यकारी अभियंता पद पर 1970 से 1992 की अवधि के दौरान हुई पदोन्नतियों की 1983 के नियमों के अनुसार समीक्षा करके संशोधित वरिष्ठता सूचियां 1994 और 1995 में अंतिम रूप से प्रकाशित की थीं। इन वरिष्ठता सूचियों को 1999 में महाराष्ट्र प्रशासनिक अधिकरण, मुंबई में चुनौती दी गई थी। याचिका का मुख्य मुद्दा आरक्षित वर्ग के अधिकारियों को निर्धारित कोटे से बाहर दी गई पदोन्नतियों और उनकी सेवा वरिष्ठता से संबंधित था। इस मामले में अधिकरण ने 2000 में 1983 के नियमों के अनुसार पदोन्नति और सेवा वरिष्ठता के संबंध में दिशानिर्देश जारी किए थे। सरकार ने इन दिशानिर्देशों में से केवल आरक्षण से संबंधित दिशानिर्देशों को उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उच्च न्यायालय ने आरक्षण से संबंधित दिशानिर्देशों को छोड़कर अन्य सभी दिशानिर्देशों को 2005 के आदेश द्वारा बरकरार रखा।
उच्च न्यायालय के इस आदेश के अनुसार जल संसाधन विभाग ने 1970 से 1995 की अवधि के दौरान हुई पदोन्नतियों की 1983 के नियमों के अनुसार समीक्षा करके उसके अनुरूप वरिष्ठता सूचियां 2005, 2007 और 2010 में प्रकाशित कीं। सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय और महाराष्ट्र प्रशासनिक अधिकरण के 1977 से 2005 की अवधि के दौरान अंतिम रूप से दिए गए आदेशों को ध्यान में रखते हुए पदोन्नति, सेवा वरिष्ठता और आरक्षण से संबंधित सभी मामलों को 2005 में अंतिम रूप दे दिया गया।












