सोयाबीन झुलसा, भूजल स्तर घटा, प्रति एकड़ 50 से 60 हजार रुपये की मदद की मांग
लोकवाहिनी, संवाददाता
छत्रपति संभाजीनगर। मराठवाडा के सूखे की स्थिति का जायजा लेने के लिए तीन सदस्यीय केंद्रीय दल पहुंचा है और दल ने किसानों के खेतों में जाकर प्रत्यक्ष निरीक्षण शुरू कर दिया है। निरीक्षण दौरे की शुरुआत छत्रपति संभाजीनगर जिले के वाहेगांव देमणी से की गई। इस दौरान किसानों ने झुलसे हुए फसलों को दिखाते हुए प्रति एकड़ 50 से 60 हजार रुपये की मदद की मांग की। साथ ही, भारी नुकसान होने के कारण पंचनामा (नुकसान मूल्यांकन) की शर्त के बिना सीधे मदद की घोषणा करने की मांग भी किसानों ने की। केंद्रीय दल ने वाहेगांव देमणी में किसान साईनाथ शिंदे के खेत का निरीक्षण किया। इस दौरान शिंदे ने फसलों की स्थिति दिखाते हुए हुए नुकसान की जानकारी अधिकारियों को दी। उन्होंने चार एकड़ क्षेत्र में सोयाबीन की बुवाई की थी। लेकिन बारिश की कमी के कारण पूरी फसल झुलस गई है।
सोयाबीन की बुवाई के लिए प्रति एकड़ 40 हजार रुपये से अधिक का खर्च आया है। इसलिए किसानों को कम से कम प्रति एकड़ 50 से 60 हजार रुपये की मदद मिलनी चाहिए। इससे कम मदद मिलने पर किसानों को राहत नहीं मिलेगी, ऐसा शिंदे ने बताया। स्थिति हर जगह गंभीर होने के कारण पंचनामा करने के बजाय सीधे मदद की घोषणा की जाए, ऐसी मांग भी उन्होंने की। इस बीच, केंद्रीय दल शुक्रवार को दिन भर छत्रपति संभाजीनगर, जालना और बीड जिलों में सूखे की स्थिति का जायजा लिया। उसके बाद केंद्र सरकार को रिपोर्ट पेश करेगा, ऐसी जानकारी जिलाधिकारी विनय गौड़ा ने दी। किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है, और मराठवाडा की पूरी तरह तबाही हो जाने का डर है। पहले 10 साल में एक बार सूखा पड़ता था, लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण अब बार-बार सूखे की स्थिति पैदा हो रही है। केंद्रीय दल ने प्रत्यक्ष निरीक्षण किया है, जिससे स्थिति की गंभीरता समझ आएगी और किसानों को ठोस मदद मिल सकेगी। हालांकि, किसान सोमनाथ शिंदे ने उम्मीद जताई है कि प्रति एकड़ कम से कम 50 हजार रुपये की मदद मिलने पर किसानों को सच्ची राहत मिलेगी।
बांधों में केवल 30.7% पानी का भंडार
मराठवाडा के बांधों में वर्तमान में केवल 30.7% पानी का भंडार उपलब्ध है। अगले साल अगस्त तक पीने के पानी के लिए भंडार रखना आवश्यक होने के कारण इस साल के रबी सीजन की बुवाई पर भी असर पड़ने की संभावना है। नांदेड और हिंगोली को छोड़कर, जालना, परभणी और लातूर जिलों में भूजल स्तर पिछले 5 वर्षों के औसत से 4 से 5 मीटर नीचे चला गया है, यह जानकारी विभागीय आयुक्त जी. श्रीकांत ने केंद्रीय टीम को दी। पीने के पानी की संभावित कमी को देखते हुए, उन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है जहां बारिश में 20% से अधिक की कमी और भूजल स्तर में 3 मीटर से अधिक की गिरावट आई है। वर्तमान में, क्षेत्र के 190 गांवों और 157 बस्तियों में टैंकों से पानी की आपूर्ति की जा रही है, और 603 कुओं का अधिग्रहण किया गया है। संभावित जल संकट का सामना करने के लिए 5,136 टैंकरों और 6,960 कुओं की योजना बनाई गई है। साथ ही, पशुधन के लिए वर्तमान में 121 दिनों के लिए पर्याप्त चारा उपलब्ध है। संभावित चारा संकट को देखते हुए चारा शिविर शुरू करने की भी योजना बनाई गई है, यह जानकारी विभागीय आयुक्त जी. श्रीकांत ने केंद्रीय टीम को दी।
केंद्रीय दल के लिए एक दिन पहले समीक्षा बैठक
सूखे की स्थिति का निरीक्षण करने आए केंद्रीय दल को संभागीय आयुक्त जी. श्रीकांत ने एक दिन पहले संभागीय आयुक्त कार्यालय में एक समीक्षा बैठक लेकर जानकारी दी। इस दौरान वर्षा, बारिश में अंतराल, खरीफ फसलों की स्थिति, फसलों का नुकसान, पीने के पानी की उपलब्धता, बांधों में पानी का भंडार, चारा और उपग्रह आधारित फसल की स्थिति के बारे में विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की गई। कृषि और किसान कल्याण विभाग के संयुक्त सचिव एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी मुक्तानंद अग्रवाल के नेतृत्व वाले इस केंद्रीय दल में महालनोबिस् राष्ट्रीय फसल पूर्वानुमान केंद्र के उपनिदेशक सुनील कुमार दुबे, नीति आयोग के सलाहकार डॉ. जसपाल सिंह और पशुपालन एवं डेयरी विभाग की पशुधन अधिकारी डॉ. साक्षी भदौरिया शामिल हैं। इस दौरान राज्य के कृषि विभाग के सचिव परिमल सिंह उपस्थित थे।
खरीफ फसलों को झटका
इस साल मराठवाडा में बारिश की कमी से खरीफ फसलों को भारी नुकसान हुआ है, और औसत की तुलना में लगभग 35% बारिश की कमी दर्ज की गई है। इस क्षेत्र में अब तक औसतन केवल 65.35% बारिश हुई है। जून में संतोषजनक बारिश के बाद जुलाई, अगस्त और सितंबर में बारिश की मात्रा घट गई। विशेष रूप से अगस्त में बारिश की लंबी अवधि के अंतराल का फसलों पर असर पड़ा है। मराठवाडा में खरीफ सीजन में 52 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई हुई है, जबकि रबी सीजन की बुवाई अब तक केवल 6,800 हेक्टेयर क्षेत्र में हुई है। क्षेत्र के 496 राजस्व मंडलों में से 37 मंडलों में 30 दिनों से अधिक, और 155 मंडलों में 21 से 30 दिनों का बारिश का अंतराल दर्ज किया गया है। खरीफ बुवाई क्षेत्र में लगभग 56% क्षेत्र में सोयाबीन की खेती की गई है। हालांकि, बारिश की कमी के कारण कपास की वृद्धि रुक गई है और कलियों व फूलों के झड़ने की दर बढ़ गई है। मक्का, बाजरा और उड़द की फसलों को भी बारिश की कमी का सामना करना पड़ा है।










