विसर्जन की जगह सालभर होगी प्रतिमा की देखभाल
विश्वकर्मा गणेश मंडल की 38 वर्षों से जारी है परंपरा
लोकाह्विनी, संवाददाता
अकोला। गणेशोत्सव के चलते इन दिनों पूरे महाराष्ट्र में उत्साह और भक्तिमय वातावरण है। कई स्थानों पर डेढ़, पांच और सात दिनों के गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन भी किया जा चुका है। हालांकि, इस वर्ष कम बारिश के कारण विदर्भ, मराठवाड़ा और अहिल्यानगर क्षेत्र में सूखे की स्थिति गंभीर होती जा रही है। जलस्रोतों में पानी का स्तर लगातार कम होने से अब इसका असर गणेश प्रतिमा विसर्जन पर भी पड़ने की संभावना है। ऐसे में अकोला में गणेश प्रतिमा विसर्जन के बजाय उसे अगले वर्ष तक सुरक्षित रखने का अनोखा विकल्प सामने आया है। जिले के कुछ गणेश मंडलों ने इस वर्ष प्रतिमा का विसर्जन नहीं करने का निर्णय लिया है। खास बात यह है कि अकोला के मोमिनपुरा स्थित विश्वकर्मा गणेश मंडल पिछले 38 वर्षों से गणेश प्रतिमा के विसर्जन के बजाय उसके संरक्षण की परंपरा निभा रहा है।
बारिश का इंतजार करते-करते इस वर्ष मानसून ने निराश किया है। खेतों से लेकर जलस्रोतों तक पानी की कमी स्पष्ट दिखाई दे रही है। अकोला में गणेश मूर्तियों के विसर्जन के प्रमुख स्थान गांधीग्राम स्थित पूर्णा नदी के साथ ही बालापुर क्षेत्र की मन और महेश नदियों में भी पानी कम है। विशेष रूप से बड़ी और ऊंची गणेश प्रतिमाओं के विसर्जन को लेकर इस वर्ष चिंता बढ़ गई है। ऐसी परिस्थिति में श्रद्धा और परंपरा को कायम रखते हुए पानी की बचत का विकल्प तलाशा जा रहा है। अकोला जिले में छोटे-बड़े मिलाकर करीब 1,984 गणेश मंडल हैं। इनमें से कुछ मंडलों ने इस वर्ष गणेश प्रतिमा का विसर्जन नहीं करने का निर्णय लिया है। इस पहल के तहत गणेशोत्सव समाप्त होने के बाद प्रतिमा को विसर्जित करने के बजाय सुरक्षित स्थान पर रखा जाता है। पूरे वर्ष उसकी देखभाल की जाती है। अगले वर्ष गणेशोत्सव से पहले प्रतिमा की आवश्यक रंगाई-पुताई और सजावट की जाती है और उसी प्रतिमा की दोबारा विधिवत स्थापना की जाती है। इससे एक ओर गणेशोत्सव की परंपरा कायम रहती है, वहीं दूसरी ओर विसर्जन के लिए पानी का उपयोग करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। अकोला के मोमिनपुरा क्षेत्र का विश्वकर्मा गणेश मंडल पिछले 38 वर्षों से गणेश प्रतिमा का विसर्जन नहीं करता।
गणेशोत्सव समाप्त होने के बाद प्रतिमा को सुरक्षित रखा जाता है और पूरे वर्ष उसकी देखभाल की जाती है। अगले गणेशोत्सव में उसी प्रतिमा की रंगाई-पुताई कर दोबारा स्थापना की जाती है। इस वर्ष सूखे की स्थिति को देखते हुए मंडल ने अन्य गणेश मंडलों से भी प्रतिमा विसर्जन के बजाय उसके संरक्षण पर विचार करने की अपील की है।
श्रद्धा के साथ पानी बचाने का संदेश
गणेशोत्सव श्रद्धा और आस्था का पर्व है, लेकिन वर्तमान जलसंकट को देखते हुए पानी की बचत भी जरूरी है। ऐसे समय में प्रतिमा विसर्जन के बजाय उसे सुरक्षित रखने की पहल श्रद्धा, परंपरा और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने का प्रयास है। अकोला में 38 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा इस वर्ष सूखे की परिस्थितियों के कारण एक बार फिर चर्चा में है। ‘विसर्जन के बजाय संरक्षण’ का यह अकोला पैटर्न जलसंकट के बीच गणेशोत्सव मनाने का एक वैकल्पिक रास्ता सामने रख रहा है।













