तान्हा पोला के लिए बाजारों में बढ़ी रौनक
लोकवाहिनी संवाददाता
गोंदिया। किसान और ग्रामीण संस्कृति से जुड़े पोला पर्व की तैयारियां शुरू होते ही बाजारों में भी रौनक बढ़ गई है। बैलपोला के अगले दिन मनाए जाने वाले तान्हा पोला को लेकर बच्चों में खासा उत्साह देखने को मिल रहा है। इस अवसर पर बच्चों के लिए आकर्षक लकड़ी के नंदीबैल खरीदने की परंपरा है। इसी बीच बुधवार को गोंदिया के साप्ताहिक बाजार में 50 हजार रुपये कीमत का काष्ठ नंदी बिक्री के लिए पहुंचा, जो लोगों के आकर्षण का केंद्र बना रहा।
गोरेगांव के काष्ठ कलाकार एवं विक्रेता श्याम झाड़े द्वारा तैयार किए गए इस नंदीबैल पर बारीक कलकारी, आकर्षक रंगरोगन और सजावट की गई है। झाड़े के अनुसार, इस काष्ठ नंदी की बिक्री 50 हजार रुपये में हुई। पहले जहां तान्हा पोला के लिए मिट्टी या साधारण लकड़ी से नंदीबैल बनाए जाते थे, वहीं अब उनमें कलात्मकता और आकर्षक सजावट का समावेश होने लगा है। इसके चलते बड़े और भव्य काष्ठ नंदी भी बाजार में दिखाई देने लगे हैं। तान्हा पोला केवल बच्चों का त्योहार नहीं है, बल्कि यह नई पीढ़ी को खेती, बैल और ग्रामीण जीवन की परंपराओं से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण सांस्कृतिक परंपरा है।
समय के साथ इस पर्व के स्वरूप में बदलाव आया है। अब घुंघरू, आभूषण और आकर्षक रंगों से सजाए गए नंदीबैल बच्चों को खासे पसंद आ रहे हैं। कई स्थानों पर बड़े आकार के काष्ठ नंदी भी तैयार किए जा रहे हैं। इससे पारंपरिक कला को नया बाजार मिलने के साथ ही काष्ठ शिल्पकारों के लिए भी रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं। तान्हा पोला की शोभायात्राओं में भी अब आधुनिकता की झलक दिखाई देने लगी है। ढोल-ताशों के साथ विद्युत रोशनी, सजे हुए वाहन और आकर्षक नंदी सजावट का चलन बढ़ा है। इसके अलावा फैंसी ड्रेस और विभिन्न प्रतियोगिताओं के आयोजन से भी त्योहार का स्वरूप अधिक उत्सवमय हो गया है। बच्चे किसान, बालकृष्ण, छत्रपति शिवाजी महाराज, सेना के मेजर सहित विभिन्न पारंपरिक और देशभक्ति से जुड़े रूपों में शामिल होते हैं। पोला पर्व के बाद नंदीबैल लेकर रिश्तेदारों और परिचितों के घर जाने तथा वहां से ‘बोजारा’ लेने की परंपरा भी कई क्षेत्रों में आज भी कायम है।
परंपरा के साथ बढ़ रही काष्ठ कला की पहचान
तान्हा पोला के कारण काष्ठ नंदीबैल की कलात्मकता और कीमत दोनों में बदलाव देखने को मिल रहा है। गोंदिया के साप्ताहिक बाजार में 50 हजार रुपये का काष्ठ नंदी इस बदलती परंपरा और ग्रामीण संस्कृति में शामिल हो रही आधुनिक कलात्मकता का उदाहरण बनकर सामने आया।












