प्रस्तावना
पानी किसी भी क्षेत्र के विकास का मूलभूत साधन है। कृषि, उद्योग, पेयजल, पर्यावरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था-इन सभी की नींव जलसंसाधन पर ही टिके होती है। महाराष्ट्र का विदर्भ क्षेत्र प्राकृतिक रूप से नदियों से समृद्ध होने के बावजूद, पानी का असमान वितरण इसकी सबसे बड़ी समस्या है। कुछ क्षेत्रों में हर वर्ष अत्यधिक वर्षा होती है और अरबों घनमीटर पानी नदी के माध्यम से राज्य के बाहर या समुद्र की ओर बह जाता है, जबकि दूसरी ओर अनेक तहसीलें पेयजल के लिए टैंकों पर निर्भर रहती हैं। ऐसी स्थिति में जहां पानी अधिक है वहां से जहां पानी की कमी है वहां तक पानी पहुंचाने की अवधारणा सामने आई और इसी से नदी जोड़ परियोजनाओं का विकास विकसित हुआ।
विस्तृत
एक ओर बाढ़ तो दूसरी ओर सूखा-ऐसी स्थिति पिछले कुछ वर्षों से लगातार हमें परेशान कर रही है। यदि इस स्थिति को बदलना है, तो नदी जोड़ परियोजना के अलावा कोई दूसरा विकल्प सामने नहीं है। इसी उद्देश्य से देश स्तर पर नदी जोड़ परियोजना की शुरुआत की जाए, ऐसी योजना तत्कालीन केंद्रीय जलसंसाधन मंत्री के.एल. राव ने 1972 में प्रस्तुत की थी। इस योजना को आगे बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने वर्ष 1982 में राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी की स्थापना की। वर्ष 1990 में अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने के बाद इस योजना को आगे बढ़ाने के लिए सकारात्मक कदम उठाए गए और तत्कालीन जल संसाधन मंत्री सुरेश प्रभु ने वास्तविक अर्थों में नदी जोड़ परियोजना का अध्ययन कर उसे उचित दिशा देने का प्रयास किया।
इसके बाद वैनगंगा-नलगंगा जोड़ परियोजना पीछे छूटती चली गई। न तो शासन का इस पर ध्यान था और न ही प्रशासन का। इसके बाद इस परियोजना की मांग जल विशेषज्ञ तथा विदर्भ के सुपुत्र डॉ. प्रवीण महाजन ने वर्ष 2014 में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के समक्ष रखी। इसके बाद जल संसाधन विभाग को इस परियोजना को पूरा करने के लिए रिपोर्ट तैयार करने के निर्देश दिए गए थे। इस पर जल संसाधन विभाग ने वर्ष 2015 में राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण को रिपोर्ट पूरी करने के संबंध में पत्र भेजा था। इसके अनुसार नवंबर 2018 में वैनगंगा से नलगंगा नदी जोड़ परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। एक-एक कदम आगे बढ़ाते हुए केंद्र सरकार के अधीन कार्यकारी अभियंता, राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण ने दिसंबर 2018 में विस्तृत परियोजना रिपोर्ट महानिदेशक, राष्ट्रीय जल विकास प्राधिकरण, नई दिल्ली को प्रस्तुत की। इस योजना का उद्देश्य गोदावरी बेसिन के अतिरिक्त जल को तापी बेसिन की ओर मोड़कर विदर्भ के वर्षा-आधारित शुष्क क्षेत्रों को जीवनदायिनी उपलब्ध कराना है।
विदर्भ की जल वास्तविकता
विदर्भ में औसत वर्षा तुलनात्मक रूप से अच्छी होने के बावजूद उसका वितरण अत्यंत असमान है। पूर्वी विदर्भ के भंडारा, गोंदिया, गढ़चिरौली और नागपुर के कुछ हिस्सों में मूसलाधार वर्षा होती है। वैनगंगा, वर्धा, पैनगंगा, प्राणहिता जैसी नदियों में बड़ी मात्रा में पानी बहता है। लेकिन पश्चिमी विदर्भ के अकोला, वाशिम, बुलढाणा और यवतमाल के कई क्षेत्रों में वर्षा कम और अनिश्चित होती है। परिणामस्वरूप, एक ओर बाढ़ और दूसरी ओर सूखे जैसी विरोधाभासी स्थिति उत्पन्न होती है। इसी कारण जल का संतुलित उपयोग करने की आवश्यकता पिछले कई दशकों से रेखांकित की जाती रही है।
नदी जोड़ अवधारणा कैसे अस्तित्व में आई?
भारत में नदी जोड़ परियोजना की अवधारणा नई नहीं है। विभिन्न नदी घाटियों के अतिरिक्त जल का उपयोग जल संकटग्रस्त क्षेत्रों के लिए करने का विचार कई दशक पहले प्रस्तुत किया गया था। राष्ट्रीय स्तर पर नदी जोड़ कार्यक्रम का उद्देश्य बाढ़ और सूखे, दोनों समस्याओं का दीर्घकालिक समाधान खोजना है। महाराष्ट्र में भी विभिन्न नदी घाटियों के जल का संतुलित नियोजन करने की आवश्यकता बार-बार व्यक्त की जाती रही है। गोसीखुर्द राष्ट्रीय परियोजना के कारण वैनगंगा नदी के अतिरिक्त जल का उपयोग करने का अवसर उपलब्ध हुआ। इसी से इस जल को तापी घाटी की नलगंगा नदी की ओर मोड़ने का प्रस्ताव तैयार किया गया।
गोसीखुर्द परियोजना से संबंध
गोसीखुर्द (इंदिरासागर) महाराष्ट्र की एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सिंचाई परियोजना है। इस परियोजना में बड़ी मात्रा में जल का भंडारण किया जाता है। वर्षा ऋतु में कई बार अतिरिक्त पानी नदी के पात्र से आगे बह जाता है। जलविज्ञान संबंधी अध्ययनों के अनुसार इस अतिरिक्त जल का उपयोग अन्य जल संकटग्रस्त क्षेत्रों के लिए किया जा सकता है। इसके अनुसार 1804.78 मिलियन घनमीटर (द.ल.घ.मी.) जल को वैनगंगा नदी से नलगंगा घाटी की ओर मोड़ने की योजना तैयार की गई। परियोजना की मूलभुत अवधारणा इस परियोजना के अंतर्गत गोसीखुर्द बांध के निकट उपलब्ध अतिरिक्त जल को वर्षा ऋतु के लगभग 70 दिनों की अवधि में उठाकर 388.28 किलोमीटर लंबी संपर्क नहर के माध्यम से विभिन्न भंडाराय जलाशयों तक पहुँचाया जाएगा। वहाँ से इस जल का सिंचाई, पेयजल तथा औद्योगिक उपयोग के लिए योजनाबद्ध तरीके से वितरण किया जाएगा। इसमें वर्षा ऋतु के अतिरिक्त जल की बर्बादी रोककर उसका योजनाबद्ध पुनर्वितरण करना मुख्य विचार है।
परियोजना की आवश्यकता क्यों उत्पन्न हुई?
इस परियोजना के पीछे कई कारण हैं। पहला, विदर्भ में सिंचाई का कम प्रतिशत। कई जिलों में खेती आज भी वर्षा पर निर्भर है। वर्षा कम होने पर उत्पादन घटता है और किसान आर्थिक संकट में फंस जाता है। दूसरा, भूजल स्तर में लगातार गिरावट। कुओं और बोरवेलों पर बढ़ते दबाव के कारण क्षेत्रों में भूजल तेजी से नीचे जा रहा है। तीसरा, बढ़ता औद्योगिकीकरण। नागपुर, अमरावती, अकोला और अन्य शहरों में औद्योगिक निवेश बढ़ रहा है। इसके लिए विश्वसनीय जल स्रोत आवश्यक है। चौथा, बढ़ती जनसंख्या। भविष्य की पेयजल आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए दीर्घकालिक योजना बनाना आवश्यक हो गया है।
किन जिलों को लाभ?
इस परियोजना का लाभ निम्नलिखित आठ जिलों को होगा: भंडारा, नागपुर, वर्धा, अमरावती, यवतमाल, अकोला, वाशिम और बुलढाणा। इन जिलों के 4,04,281 हेक्टेयर कृषि योग्य क्षेत्र को सिंचाई के दायरे में लाने का लक्ष्य है।
जल सुरक्षा की दृष्टि से महत्व
जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। कम दिनों में अत्यधिक वर्षा और शेष समय में शुष्क वातावरण जैसी स्थिति बन रही है। इसलिए पानी का भंडारण करना और उसे उचित स्थानों तक पहुंचाना भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता है। वैनगंगा-नलगंगा नदी जोड़ परियोजना को इस बदलते जलवायु परिदृश्य का उत्तर देने वाला दीर्घकालिक जल प्रबंधन प्रयास माना जाता है।
विदर्भ के लिए अपेक्षित परिवर्तन
इस परियोजना से केवल सिंचाई ही नहीं बढ़ेगी, बल्कि ग्रामीण क्षेत्र की आर्थिक स्थिति में भी बदलाव आने की संभावना है। सिंचाई उपलब्ध होने पर फसल पद्धति बदल सकती है, कृषि प्रसंस्करण उद्योग बढ़ सकते हैं, रोजगार सृजन हो सकता है और ग्रामीण पलायन कम करने में सहायता मिल सकती है। इसके अलावा, औद्योगिक क्षेत्रों को आवश्यक पानी उपलब्ध हो जाता है, तो नए निवेश को भी प्रोत्साहन मिल सकता है। अवधारणा से लेकर वास्तविक कार्यान्वयन तक इस प्रकार की परियोजनाएं केवल इंजीनियरिंग तक सीमित नहीं होतीं। इनमें जलविज्ञान, पर्यावरण, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, पुनर्ववास, ऊर्जा और प्रशासन जैसे सभी क्षेत्रों के समन्वय की आवश्यकता होती है। इसलिए इस परियोजना के लिए जल उपलब्धता का अध्ययन, तकनीकी सर्वेक्षण, विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन, आर्थिक विश्लेषण, पर्यावरणीय मूल्यांकन तथा विभिन्न विभागों की स्वीकृति की प्रक्रिया पूरी की गई है।
आगे की राह
प्रशासनिक स्वीकृति मिलने के बाद अब इस परियोजना के कार्यान्वयन की जिम्मेदारी और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। इतनी बड़ी परियोजना में गुणवत्तापूर्ण कार्य, समय का उचित प्रबंधन, लागत पर नियंत्रण और जनता का विश्वास बनाए रखना बड़ी चुनौतियां होंगी। वैनगंगा-नलगंगा नदी जोड़ परियोजना विदर्भ के जल इतिहास का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। एक नदी बेसिन के अतिरिक्त जल को दूसरे जल-संक्रांत बेसिन की ओर मोड़कर कृषि, उद्योग और पेयजल की समस्या का समाधान करने का यह प्रयास है। हालांकि, ऐसी परियोजनाओं की सफलता केवल योजना पर निर्भर करती है, बल्कि पारदर्शी कार्यान्वयन, पर्यावरणीय संतुलन, उचित पुनर्ववास और दीर्घकालिक जल नियोजन पर भी निर्भर करेगी।
(लेखक यह जल विशेषज्ञ डॉ. शंकरराव चव्हाण राज्यस्तरीय जलभूषण पुरस्कार से सम्मानित हैं। साथ ही वे वैनगंगा-नलगंगा परियोजना के प्रणेता हैं।)
यह श्रृंखला वैनगंगा-नलगंगा जोड़ परियोजना की संपूर्ण जानकारी किसानों, ग्रामीणों और कामगारों को उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई है।













