चिखली। धार्मिक उत्सवों को सामाजिक जागरूकता से जोड़ने की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए मालीपुरा स्थित महात्मा फुले गणेश मंडल, चिखली ने इस वर्ष गणेशोत्सव में एक संवेदनशील और समाज को आईना दिखाने वाली झांकी प्रस्तुत की है। मंडल की यह झांकी चिखली शहर और आसपास के क्षेत्र में चर्चा तथा आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। मंडल ने इस वर्ष केवल रोशनी और सजावट तक उत्सव को सीमित न रखते हुए समाज और पर्यावरण से जुड़े गंभीर मुद्दों को झांकी के माध्यम से सामने रखा है। इसमें भगवान गणेश की प्रतिमा को आधुनिक किसान के रूप में प्रस्तुत किया गया है। सिर पर फेंटा, पारंपरिक सदरा-धोती और चेहरे पर करुणा के भाव लिए बप्पा को किसान के रूप में दिखाया गया है। झांकी के माध्यम से प्रकृति के संरक्षण और प्राणिमात्र के प्रति दया का संदेश दिया गया है।
झांकी में प्लास्टिक कचरे से बेजुबान पशुओं को होने वाले नुकसान का बेहद संवेदनशील चित्रण किया गया है। इसमें एक सफेद गाय के मुंह में प्लास्टिक की थैली फंसी हुई दिखाई गई है। सड़क किनारे और खुले स्थानों पर फेंके गए प्लास्टिक और कचरे के कारण भोजन की तलाश में पशु उसे खा लेते हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य और जीवन पर गंभीर खतरा पैदा होता है। इसी संदेश को और प्रभावी बनाने के लिए झांकी में प्लास्टिक खाने के कारण बीमार पड़े एक बछड़े का दृश्य भी दिखाया गया है। गणेशजी के वाहन मूषकराज को डॉक्टर की वेशभूषा में बछड़े की जांच और उपचार करते हुए दर्शाया गया है। मास्क, डॉक्टर का कोट और स्टेथोस्कोप पहने मूषकराज का यह दृश्य लोगों को मनुष्य की लापरवाही और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी पर सोचने के लिए मजबूर करता है। वहीं किसान के रूप में बप्पा को बेजुबान पशुओं की रक्षा करते हुए दिखाया गया है। मंडल ने पशुओं के साथ-साथ चिखली की जीवनदायिनी मानी जाने वाली जामुवंती नदी की वर्तमान स्थिति को भी झांकी में प्रमुखता से स्थान दिया है। फलक के माध्यम से नदी की व्यथा को भावपूर्ण तरीके से प्रस्तुत किया गया है।
झांकी में नदी के संदेश के माध्यम से बताया गया है कि कभी उसका पानी स्वच्छ और निर्मल था तथा उसके किनारे हरियाली और जीवन फलता-फूलता था। लेकिन वर्तमान में प्लास्टिक, कचरे और गंदगी के कारण नदी का अस्तित्व प्रभावित हो रहा है। नागरिकों से नदी में कचरा न डालने और उसे स्वच्छ रखने की अपील की गई है।













