शिवसेना विवाद : कपिल सिब्बल का सुप्रीम कोर्ट में तर्क
लोकवाहिनी, संवाददाता
नई दिल्ली। निर्वाचन आयोग के पास कोई अधिकार क्षेत्र नहीं था, केवल एकनाथ शिंदे को लाभ पहुंचाने के लिए निर्वाचन आयोग ने अधिकार क्षेत्र से बाहर का निर्णय लिया, ऐसा तर्क उबाठा गुट के वकील कपिल सिब्बल ने गुरुवार को सर्वोच्च न्यायालय में दिया। एकनाथ शिंदे को 2018 का संविधान मान्य नहीं था, तो उस समय आपत्ति क्यों नहीं जताई? उन्होंने किस आधार पर अपनी अलग कार्यकारिणी घोषित की? ऐसा सवाल सिब्बल ने किया। सिब्बल ने लगातार पांचवें दिन ठाकरे गुट की ओर से तर्क दिया। निर्वाचन आयोग का निर्णय कैसे गलत था और उसके अनुसार उस समय के विधायक कैसे अयोग्य थे, यह बताने पर कपिल सिब्बल का जोर था। एकनाथ शिंदे के बगावत के बाद शिवसेना में दो गुट हो गए। उस समय निर्वाचन आयोग ने शिवसेना पार्टी और चुनाव चिन्ह शिंदे के गुट को सौंप दिया। इस पर ठाकरे गुट ने आपत्ति जताई है और, इससे संबंधित सुनवाई अंतिम चरण में आ गई है। एकनाथ शिंदे को केवल विधायकों की संख्या के आधार पर मुख्यमंत्री पद दिया गया। लेकिन, वास्तविकता अलग थी। पार्टी में विभाजन के बाद की बातों पर ध्यान न दें, ऐसा कोर्ट ने कहा था। हालांकि, निर्वाचन आयोग ने उन्हीं बातों के
आधार पर निर्णय लिया। दसवीं अनुसूची के अनुसार, अयोग्य ठहराए जाने वाले व्यक्ति को केवल विधायकों की संख्या के आधार पर मुख्यमंत्री पद दिया गया, ऐसा दावा सिब्बल ने किया। एकनाथ शिंदे ने बगावत करने के बाद कहा कि उन्हें 2018 का संविधान मान्य नहीं था। लेकिन उसी के आधार पर वे विधायक और मंत्री बने थे। पार्टी के संविधान के अनुसार पार्टी का कामकाज चलता है। उस समय एकनाथ शिंदे को कोई आपत्ति नहीं थी। लेकिन विधानमंडल में विभाजन होने के बाद शिंदे ने कहा कि 2018 का पार्टी का संविधान मान्य नहीं है।
विधायक दल में टूट ही पार्टी का विभाजन नहीं
बुधवार की सुनवाई में पीठ ने कहा था कि पहले यह देखना होगा कि शिवसेना में वास्तव में विभाजन हुआ था या नहीं। पीठ ने यह भी कहा था कि विभाजन विधायक दल से शुरू होकर संगठन और प्राथमिक सदस्यता तक पहुंच सकता है। सिब्बल ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दल में विभाजन केवल विधायक दल में टूट से नहीं हो सकता। उनके मुताबिक संविधान पीठ के एक फैसले में यह सिद्धांत पहले ही तय किया जा चुका है। उन्होंने निर्वाचन आयोग के आकलन पर भी सवाल उठाया। सिब्बल ने पूछा कि आयोग ने यह तय करते समय किन आधारों पर माना कि पार्टी के भीतर वास्तविक विवाद था और क्या शिंदे गुट ने शिवसेना के संविधान के तहत उपलब्ध आंतरिक उपायों का इस्तेमाल किया था।













