किसी भी बड़ी सिंचाई परियोजना की सफलता केवल उसकी अवधारणा पर निर्भर नहीं होती, बल्कि उसके पीछे की तकनीकी योजना, जलविज्ञान का अध्ययन, अभियांत्रिकी संरचना और पानी के सटीक प्रबंधन पर निर्भर होती है। वैनगंगा-नलगंगा नदी जोड़ परियोजना केवल नदी का पानी एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने का उपक्रम नहीं है, बल्कि जलसंसाधन का वैज्ञानिक पुनर्वितरण करने वाली एक अत्यंत जटिल अभियांत्रिकी परियोजना है। इस योजना में पानी की उपलब्धता, उठाव, परिवहन, भंडारण और वितरण इन सभी पहलुओं की सूक्ष्मता से योजना बनाई गई है। इसलिए यह परियोजना महाराष्ट्र की सबसे बड़ी और आधुनिक जल अभियांत्रिकी परियोजनाओं में से एक के रूप में पहचानी जा रही है। परियोजना की तकनीकी अवधारणा वैनगंगा-नलगंगा नदीजोड़ परियोजना का मुख्य उद्देश्य गोसीखुर्द (इंदिरासागर) परियोजना में वर्षा ऋतु के दौरान उपलब्ध होने वाले अतिरिक्त पानी को तापी बेसिन की नलगंगा नदी की ओर मोड़ना है। इस योजना में कुल 1804.78 मिलियन घनमीटर (द.ल.घ.मी.) पानी जोड़ नहर के माध्यम से स्थानांतरित किया जाएगा। यह पानी मुख्य रूप से वर्षा ऋतु के अतिरिक्त प्रवाह से उपलब्ध होगा और उसका अपव्यय रोकना इस योजना का मुख्य उद्देश्य है।
70 दिनों की पानी उठाव अवधि
इस परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी मुद्दा 70 दिनों की पानी उठाव अवधि है। जलविज्ञान विशेषज्ञों ने कई दशकों के वर्षामान, नदी प्रवाह और जल उपलब्धता का अध्ययन करके निष्कर्ष निकाला कि, गोसीखुर्द परियोजना में उपलब्ध होने वाले अतिरिक्त पानी को लगभग 70 दिनों की अवधि में सुरक्षित रूप से उठाया जा सकता है। इसी अवधि के आधार पर पूरी नहर की क्षमता, पंपिंग स्टेशन की संरचना और भंडारण जलाशयों का आकार निर्धारित किया गया है।
CWC के मानदंडों के अनुसार योजना केंद्रीय जल आयोग (CWC) के 2010 के दिशानिर्देशों के अनुसार सिंचाई परियोजना के लिए न्यूनतम 75 प्रतिशत सफलता (Dependability) आवश्यक मानी जाती है। इसलिए परियोजना की जल योजना 75 प्रतिशत विश्वसनीयता के आधार पर बनाई गई है। अर्थात प्रत्येक चार वर्षों में से कम से कम तीन वर्षों तक आवश्यक मात्रा में पानी उपलब्ध रहेगा, इस सिद्धांत पर पूरी परियोजना स्थापित की जाएगी।
388.28 किलोमीटर लंबी जोड़ नहर
इस परियोजना की रीढ़ 388.28 किलोमीटर लंबी जोड़ नहर है। इतनी बड़ी लंबाई की नहर का निर्माण अपने आप में अभियांत्रिकी की बड़ी चुनौती है। यह नहर विभिन्न भूभागों से होकर गुजरेगी, इसलिए प्रत्येक स्थान पर अलग-अलग प्रकार की संरचनाओं का उपयोग किया जाएगा। इनमें खुली नहर, कट एंड कवर (Cut & Cover), सुरंगें, जलवाहिकाएं, सुरक्षात्मक दीवारें, साइफन, पुल, फॉल स्ट्रक्चर्स, शामिल हैं।
कट एंड कवर तकनीक
जहां भूमि की स्थिति या यातायात व्यवस्था महत्वपूर्ण है, वहां Cut & Cover तकनीक का उपयोग किया जाएगा। इस पद्धति में जमीन के नीचे नहर तैयार करके उसके ऊपर फिर से मिट्टी डाली जाती है। इससे भूमि का उपयोग बना रहता है और पर्यावरण पर होने वाला प्रभाव कुछ हद तक कम हो जाता है।
बोगदों की आवश्यकता
पर्वतीय क्षेत्र, पहाड़ियां या कठिन भौगोलिक परिस्थितियों वाले क्षेत्रों में नहर को खुले रूप में बनाना संभव नहीं होता। इसके लिए आधुनिक बोगदों के निर्माण की योजना बनाई गई है। इन बोगदों से पानी का प्रवाह सुरक्षित रहेगा तथा भूमि का कम नुकसान होगा।
लिफ्ट सिंचाई व्यवस्था
इस परियोजना में सारा पानी प्राकृतिक ढाल से नहीं बहेगा। मुख्य नहर पर आठ स्थानों पर कुल 205.04 मीटर ऊंचाई तक पानी उठाने की व्यवस्था की गई है। इसके लिए बड़ी क्षमता वाले पंपिंग स्टेशन स्थापित किए जाएंगे। यह लिफ्ट योजना परियोजना का सबसे महंगा और तकनीकी दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है।
पंपिंग स्टेशन का महत्व
पानी को ऊंचाई पर ले जाने के लिए अत्यधिक विद्युत ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसलिए उच्च क्षमता वाले पंप, आधुनिक विद्युत प्रणाली, नियंत्रण प्रणाली, स्वचालित निगरानी का उपयोग किया जाएगा। भविष्य में इन पंपों के लिए सौर ऊर्जा या हरित ऊर्जा का उपयोग करने का अवसर भी उपलब्ध हो सकता है।
50 मार्गस्थ भंडारण जलाशय
वर्षा ऋतु में जमा पानी का सीधे खेती में उपयोग नहीं किया जा सकता। इसलिए पूरे मार्ग पर 50 मार्गस्थ जलाशय प्रस्तावित हैं। इनमें 32 नए जलाशय, 10 मौजूदा जलाशयों की ऊंचाई बढ़ाना, 3 बड़ी परियोजनाओं का बैलेसिंग रिज़र्ववायर के रूप में उपयोग करना शामिल है। यह भंडारण व्यवस्था परियोजना की सबसे बड़ी विशेषता है।
बैलेसिंग रिज़र्ववायर क्या है?
पानी को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने के बाद उसका संतुलन बनाए रखने के बड़े जलाशयों का उपयोग किया गया है। इस परियोजना में निम्न वर्धा, काटेपूर्णा, नलगंगा ये तीन परियोजनाएं बैलेसिंग रिज़र्ववायर के रूप में उपयोग की जाएंगी। इससे पूरे वर्ष पानी की योजना बनाना अधिक आसान होगा।
पानी की उपलब्धता का वैज्ञानिक अध्ययन
परियोजना की सफलता के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में पानी उपलब्ध है? इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए कई दशकों की वर्षा, नदी प्रवाह, बांध में भंडारण और बाढ़ की स्थिति का गहन अध्ययन किया गया। मुख्य अभियंता (जलविज्ञान एवं बांध सुरक्षा), नासिक ने परियोजना के लिए आवश्यक पानी की उपलब्धता प्रमाणित की है। इसके अनुसार लगभग 1772 द.ल.घ.मी. पानी की उपलब्धता निर्धारित की गई है, जबकि आगे की तकनीकी जाँच के बाद 1804.78 द.ल.घ.मी. पानी की योजना को स्वीकृति दी गई है।
सिंचाई नियोजन
परियोजना के कारण कुल 4,04,281 हेक्टरिय कृषि योग्य क्षेत्र को सिंचाई के अंतर्गत लाया जाएगा। यह क्षेत्र चार चरणों में विभाजित किया गया है। गोसीखुर्द से निम्न वर्धा – 1,66,041 हेक्टेयर। निम्न वर्धा से काटेपूर्णा – 1,45,039 हेक्टेयर। काटेपूर्णा से नलगंगा – 81,311 हेक्टेयर।
गुरुत्वाकर्षण और लिफ्ट सिंचाई
इस परियोजना में दो प्रकार से पानी दिया जाएगा। 1,92,652 हेक्टेयर क्षेत्र को गुरुत्वाकर्षण पद्धति से पानी तथा 2,11,629 हेक्टेयर क्षेत्र को लिफ्ट सिंचाई के माध्यम से पानी देने की योजना है। इससे भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार पानी का वितरण संभव होगा।
पेयजल एवं औद्योगिक पानी
इस परियोजना का उद्देश्य केवल खेती नहीं है। इसलिए कुल उपलब्ध पानी में से 1335.83 द.ल.घ.मी. सिंचाई के लिए, 151.20 द.ल.घ.मी. उद्योगों के लिए, 77.83 द.ल.घ.मी. घरेलू उपयोग के लिए आरक्षित रखा गया है। इससे भविष्य के नगरीकरण और औद्योगिकीकरण को भी बढ़ावा मिल सकता है।
तकनीकी चुनौतियां
इतनी बड़ी परियोजना में अनेक तकनीकी चुनौतियां हैं। 388 कि.मी. नहर का रखरखाव, अत्यधिक बिजली की आवश्यकता, पंपिंग स्टेशन की कार्यक्षमता, गाद प्रबंधन, नहरों में पानी के रिसाव को रोकना, आधुनिक नियंत्रण प्रणाली, जलवायु परिवर्तन के कारण प्रवाह में बदलाव इन सभी पहलुओं की लगातार निगरानी करनी होगी। वैनगंगा-नलगंगा नदीजोड़ परियोजना की तकनीकी संरचना उत्कृष्ट उदाहरण मानी जा सकती है। 388.28 किलोमीटर लंबी जोड़ नहर, 50 भंडारण जलाशय, 8 लिफ्ट केंद्र, 75 प्रतिशत विश्वसनीयता पर आधारित जल योजना और 4 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र के लिए तैयार की गई सिंचाई व्यवस्था से भी पहलू इस परियोजना की भव्यता को रेखांकित करते हैं। किंतु इस तकनीकी रूपरेखा की सफलता समय पर और गुणवत्तापूर्ण कार्यान्वयन पर निर्भर करेगी। परियोजना पूर्ण होने के बाद उसका नियमित रखरखाव, ऊर्जा प्रबंधन और जल वितरण में पारदर्शिता उतनी ही महत्वपूर्ण होगी। (क्रमशः)
(लेखक यह जल विशेषज्ञ डॉ. शंकरराव चव्हाण राज्यस्तरीय जलभूषण पुरस्कार से सम्मानित हैं। साथ ही वे वैनगंगा-नलगंगा परियोजना के प्रणेता हैं।)
यह श्रृंखला वैनगंगा-नलगंगा नदी जोड़ परियोजना की संपूर्ण जानकारी किसानों, ग्रामीणों और कामगारों को उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई है।













